कविता संग्रह: ‘मैंने अपनी माँ को जन्म दिया है’ – रश्मि भारद्वाज
प्रकाशन: सेतु प्रकाशन (setuprakashan.com)

कविताएँ पढ़ते वक़्त सोचा एक पाठक के तौर पर मैं कविताओं को पढ़कर आए हर उस पहले ख़याल को दर्ज करता चलूँ!

कविता और स्त्रैण मन दोनों एक दूसरे के पर्याय हैं। स्त्रैण मन का सफ़र एक बिंदु से शुरू होता है और धीरे-धीरे विस्तार लेता है और हर एक चीज़ को छूता चला जाता है। जैसे आप शांत तालाब में पत्थर फेंके और पत्थर और पानी के सम्पर्क से केंद्र बनता है और वर्तुल घेरा धीरे-धीरे तालाब के आख़िरी किनारे की ओर विस्तार लेने लगता है। तालाब का कोई कोना छूट पाना असम्भव हो जाता है। यहाँ दर्ज कविताओं में आए शब्दों को अलग-अलग विषय के रूप में सजाया जाए तो हम पाते हैं- यह जीवन के हर सूक्ष्म विषय से लेकर विस्तृत आकाश तक फैल रहा है। उपस्थिति को दर्ज करना आसान है, पर जब अनुपस्थित को भी दर्ज किया जाए तो यह कविता का स्वरूप लेना शुरू कर देता है। कविताओं में ज्ञात और अज्ञात दोनों से मिलना होता है। यहाँ दर्ज कविताएँ जीवन के उसी विस्तृत आकाश को शब्दों में लौटाने की कोशिश है।

नीत्शे कहते है- ‘ज़िन्दगी एक कम्पन है, उसे जो ठोस बना लेते हैं, क़ब्र बना लेते हैं।’ यहाँ लिखी कविताएँ कम्पन की तरह फैल रही हैं। पाठक को भी ठोस नहीं रहने देतीं। इसलिए मैं यहाँ सभी कविताओं को पढ़कर कुछ ना कुछ लिखता गया सेल्फ़ नोट्स की तरह!

आप लिखती हैं-

“….वे सभी लोग
जो हमारी ज़िन्दगी में एक बड़ी जगह घेरते हैं
धीरे-धीरे अपना आकार घटाने लगते हैं
और एक दिन ग़ायब हो जाते हैं
फिर वे हमें सपनों में मिलते हैं
या हमारी कविताओं में उतर जाते हैं”

मैं बार-बार स्त्रैण मन का ज़िक्र इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि यहाँ ‘पति की प्रेमिका के नाम’ कविता में आप लिखती हैं-

“सोचती हूँ कि तुम्हें एक घर तोड़ने का इल्ज़ाम दूँ…”

मैं इस पहले पंक्ति के पहले शब्द ‘सोचती हूँ’ पर कुछ पल रुका रहा, और पाया कि स्त्री मन कठोर शब्द को लिखने में हिचकिचाता है, रुकता है, पूछता है और फिर लिखना ‘शायद मेरे प्रेम को ठीक से ग्रहण नहीं कर पाया था’ में किसी से की जा रही शिकायत में भी ख़ुद को भी गुनहगार मानना यह कवि मन/स्त्रैण मन को सामान्य मन से अलग कर देता है। इस कविता की अंतिम सुंदर पंक्ति स्मृतियों के घने जंगल से लेकर आती है जो अफ़सोस के दुःख से लिपटा हुआ है-

“यह होता कि तुमने मेरे अतीत
और मैंने तुम्हारे वर्तमान का साझा दुःख पढ़ा होता
काश कि हमें दुःखों ने भी बाँधा होता”

मुझे लगता है कविता साहित्य का विषय हो ना हो, दर्शन का विषय ज़रूर है। दर्शन मतलब देखना। जो अव्यक्त है, उसे व्यक्त करना। अदृश्य है उसे दिखाना। यह कवि को मिली सुंदर क्षमता में से एक है।

‘कविता क्या है?’ का जवाब ढूँढना चाहें तो वो ‘आत्मा की रोशनाई’ कविता में ढूँढा जा सकता है। आपके शब्दों में यह –

“वे किसी अज्ञात ईश्वर को समर्पित
निःशब्द प्रार्थनाएँ थीं
जिनमें समाहित थे हमारे सारे भय
संशय और
अव्यक्त प्रेम

उनकी कोई लिपि या ध्वनियाँ नहीं थीं
उन्हें आत्मा की रोशनाई से लिखा गया था”

केदार नाथ सिंह को समर्पित कविता में आप लिखती हैं-

“उसकी कविता से गुज़रता कोई जानेगा
कि ज़िंदा शब्दों में होती है कितनी आँच

दुःख पढ़ता कोई और भी रोएगा उन शब्दों के साथ
जिन्हें लिखते गिरे होंगे कवि के आँसू

नष्ट हो जाएगा वो काग़ज़
दीमक कुतर जाएँगे किताबों को
लेकिन जब तक बनी हुई है हमारी भाषा
और उसके शब्द
एक कवि लौटता रहेगा”

इसे पढ़कर केदारनाथ सिंह की कविता याद आ गयी। लगा दोनों कविताएँ एक-दूसरे से सम्वाद कर रही हैं, एक-दूसरे का हाथ पकड़े!

“जाऊँगा कहाँ
रहूँगा यहीं
किसी किवाड़ पर
हाथ के निशान की तरह
पड़ा रहूँगा”

(सृष्टि पर पहरा / केदारनाथ सिंह)

मैं इनदोनों कविताओं को एक साथ, एक क्रम में पढ़ने की सलाह दूँगा पाठकों को।

कविता की यह ताक़त है कि वो आपको स्मृतियों में वापस ले जा सकती है, वो उल्टे पाँव चलवा सकती है। जनवरी में ‘अक्टूबर’ कविता पढ़ते हुए सर्दी की पहली गुनगुनी धूप का एहसास करना, और मैं स्मृतियों में घर की छत तक पहुँचकर धूप सेंक रहा हूँ कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी। आप लिखती हैं-

“यह आत्मा की गुनगुनाहट है
और देह का उत्सव राग
अतिरेकों के बीच किसी मधुर सन्धि-सा यह
मौसमों के नाम लिखा गया सबसे सुंदर प्रेम पत्र है”

यह कविता नहीं धूप है!

सुख को लिखना, बोलना, बाँटना आसान है, दुःख किसी अछूत की तरह अलग-थलग पड़ा रहता है। उसे गले लगाने की ताक़त, उस प्रेम में आए दुःख को भी प्रेम से सहलाने की ताक़त कवियों में होती है। ‘कुछ शेड्स प्रेम’ शीर्षक कविता में आप लिखती है –

“…तुम्हारी दी गई उदासी को ही
मैंने किसी ताबीज़-सा बाँध लिया है
यह मुझे उस दुःस्वप्न से बचा कर रखेगा
जो तुम्हारे प्रेम ने मुझे दिये हैं”

दुःख कविता का भोजन है, उसे सींचता है। इसका मतलब यह नहीं कि कविता के लिए दुःख को खोजा जाए, दुःख कविता को ख़ुद खोज लेता है। इसे यह भी ना समझा जाए कि कविता दुःख का पर्याय है।

दुःख और कविता को साथ-साथ कैसे लिखा जाए, पढ़ा जाए, समझा जाए, इसे यह कविता एक रास्ता दिखाती है-

“दुःख का रंग स्याह है
तुम्हारे दुःख उनके किसी काम के नहीं
उन्हें उजास का रंग चाहिए
हाँ, उस दुःख को तुमने कैसे बरता
तुम तार-तार हुए कि साबूत बचे
यह उनके काम की चीज़ है
उन्हें यह ज़रूर बताना”

‘कुछ टुकड़े जीवन’ कविता भी ‘जीवन क्या है?’ जैसे जटिल सवाल पर एक उत्तर की तलाश है। जीवन वही है, जिसका हम चुनाव कर रहे हैं। चुनाव कोई वस्तुनिष्ठ प्रश्न का सवाल-जवाब नहीं है। वह जीने के तरीक़े का परिणाम है, और वही उत्तर सही है जिससे चुनने से पहले हम किस तरीक़े से उस चुनाव के निर्णय तक पहुँच रहे होते हैं। आप लिखती हैं-

“जीवन किसी रफ़ कॉपी में पेंसिल से लिखी इबारत नहीं
जिसे मिटाया जा सके

एक ग़लत चयन
और वक्र हो जाती हैं हाथ की लकीरें
हम चुपचाप एक उम्र का गुज़रना देखते हैं”

‘वह जो कविता है’ शीर्षक कविता मुझे बुकोवस्की की कविता ‘So You Want To Be A Writer’ की याद दिला रही है। आप लिखती हैं-

“वह जो कविता है
पुकार से नष्ट हो जाती है
उसे विस्मृति दो

वो अनायास ही मिलेगी कभी
प्रतीक्षा के बाद बची हुई
असीमित सम्भावना में”

इस पूरी किताब को एक पंक्ति में बटोरने के लिये कोई कहे तो आप की ही एक कविता का शीर्षक ‘एक स्त्री का आत्म संवाद’ सबसे ख़ूबसूरती से उपयुक्त बैठता है।

यह कविता संग्रह एक यात्रा है, और हर एक कविता सुस्ताने के लिए थोड़े देर की ठौर। यह कविता संग्रह ख़ुद में एक कविता है और एक कविता एक अल्प विराम।

यहाँ छूटा शहर भी है जिसे ‘चंद्रिका स्थान’,  स्मॉग इन द सिटी’ कविताओं में जिया गया है।

और अन्त में कुँवर नारायण का कहा याद आ रहा है जिसे ‘कुँवर नारायण: एक कवि की वसीयत’ में ओम निश्छल उद्धृत करते हैं-

“कविता शब्दों में नहीं लिखी जाती है, पूरे अस्तित्व को खींचकर एक विराम की तरह कहीं भी छोड़ दी जाती है।”

(चित्र गौरव की वॉल से साभार)

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