‘Man Ke Paar’, a poem by Preeti Karn

श्रेष्ठतम कविता लिखना
उस वक़्त
सम्भव हुआ होगा
जब खाई को पाटने के
लिए नहीं बची रही
होगी
कच्ची मिट्टी की
ढेर।
ऊँचे टीलों की अकड़ से
और भी
आहत हुआ होगा
मन…!

दुखद कविताएँ
निरीह ताकती दीवारों पर
भरे मन से
उपले की भाँति
थाप दी जाती हैं…
रस में डूबी
फिर भी
श्रीहीन

सुन्दरतम कविताओं का
उद्भव प्रेम में पड़े
हृदय की थाह है
कान में भनक आवश्यक है
मृदुल तरंगों की
ध्वनियों से
बजने लगते हैं तार-तार
प्रेम में पड़ना ही होता है
कम से कम
एकबार
पारिजात!!

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प्रीति कर्ण
कविताएँ नहीं लिखती कलात्मकता से जीवन में रचे बसे रंग उकेर लेती हूं भाव तूलिका से। कुछ प्रकृति के मोहपाश की अभिव्यंजनाएं।

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