‘Matiheen Striyaan’, a poem by Anamika Pravin Sharma

स्त्रियाँ मतिहीन होती हैं
वे प्रेम करती हैं
और उसमें डूब जाती हैं आकण्ठ
न निकलना चाहती हैं और न ही तरना चाहती हैं
प्रेमी को सौंप देती हैं
अपना प्रेम का समन्दर
और चिर रिक्त हो जाती हैं
फिर कभी किसी के लिए
नहीं भर पातीं उस रिक्त पयोनिधि को
हालाँकि किसी और को
सर्वस्व समर्पण कर देती हैं
करती हैं सब कुछ यंत्रचालित-सी
पर दिल के कमरे में एक कोना रखती हैं
अनछुआ निषिद्ध-सा
जहाँ तक कभी कोई न पहुँच सके
इसलिए डाले रखती हैं
उस पर एक मोटा-सा पर्दा
बस वही तो एक जगह है
जहाँ वो करती हैं
घण्टों ख़ुद से बातें
ख़ुद से ही रूठती है और झगड़ती है
ख़ुद को मना लिया भी करती हैं
मिलती हैं उस अल्हड़ लड़की से
जिसने कभी प्रेम किया था
और ख़ाली हो गई थी
बारिश का पानी भी नहीं भर सकता उसे दुबारा
क्योंकि उसके लिए वाष्पीकरण की क्रिया ज़रूरी है
सख़्त हो चुकी भूमि से तरलता की उम्मीद कैसे
वो सख़्त ज़रूर है पर बंजर नहीं
क्योंकि वो अंकुरित करती है अपने बीज को
अपनी बची-खुची तरलता से
समर्पण ही तो आता है स्त्रियों को
हर रिश्ते की क़ीमत में
क्योंकि स्त्रियाँ मतिहीन ही तो होती हैं
नहीं आता उन्हें ख़ुद के बिखरे हुए
हिस्सों को इकठ्ठा करना
इसलिए अधूरी ही जीती हैं…