देर से उठकर
छत पर सर धोती
खड़ी हुई है
देखते ही देखते
बड़ी हुई है
मेरी प्रतिभा
लड़ते-झगड़ते
मैं आ पहुँचा हूँ
उखड़ते-उखड़ते
भी
मैंने
रोप ही दिए पैर
बैर
मुझे लेना था
पता नहीं
कब क्या लिया था
क्या देना था!

अपना एकमात्र इस्तेमाल यही किया था –
एक सुई की तरह
अपने को
अपने परिवार से निकालकर
तुम्हारे जीर्ण जीवन को सिया था।
(दोनों हाथों में सम्भाल
अपने होठों से
छुलाकर)
बहते हुए पानी में झुलाकर
अपने पाँव
मैं अनुभव कर रहा हूँ सब कुछ
बस छूकर
चला जाता है
छला जाता है
आकाश भी
सूर्य से
जो दूसरे दिन
आता नहीं है
कोई और सूर्य भेज देता है।

विजेता है
कौन
और
किसकी पराजय है—
सारा संसार अपने कामों में
फँसाए अपनी उँगलियाँ
उधेड़बुन करता है।
डरता है
मुझसे
मेरा पड़ोस।
मैं अपनी करतूतों का दरोग़ा हूँ।
नहीं, एक रोज़नामचा हूँ
मुझमें मेरे अपराध
हू-ब-हू कविताओं-से
दर्ज हैं।
मर्ज़ हैं
जितने
उनसे ज़्यादा इलाज हैं।
मेरे पास है कुछ कुत्ता-दिनों की
छायाएँ
और बिल्ली-रातों के
अन्दाज़ हैं।

मैं इन दिनों और रातों का
क्या करूँ?
मैं अपने दिनों और रातों का
क्या करूँ?
मेरे लिए तुमसे भी बड़ा
यह सवाल है।
यह एक चाल है,
मैं हरेक के साथ
शतरंज खेल रहा हूँ
मैं अपने ऊलजलूल
एकांत में
सारी पृथ्वी को बेल रहा हूँ।

मैं हरेक नदी के साथ
सो रहा हूँ
मैं हरेक पहाड़
ढो रहा हूँ।
मैं सुखी
हो रहा हूँ
मैं दुःखी
हो रहा हूँ
मैं सुखी-दुःखी होकर
दुःखी-सुखी
हो रहा हूँ
मैं न जाने किस कंदरा में
जाकर चिल्लाता हूँ : मैं
हो रहा हूँ। मैं
हो रहा हूँ ऽऽ

अनुगूँज नहीं जाती!
लपलपाती
मेरे पीछे
चली आ रही है।
चली आये।
मुझे अभी कई लड़कियों से
करना है प्रेम
मुझे अभी कई कुंडों में
करना है स्नान
अभी कई तहख़ानों की
करनी है सैर
मेरा सारा शरीर सूख चुका
मगर साबित हैं
पैर!
मैं अपना अन्धकार, अपना सारा अन्धकार
गन्दे कपड़ों की
एक गठरी की तरह
फेंक सकता हूँ।
मैं अपनी मार खायी हुई
पीठ
सेंक सकता हूँ
धूप में
बेटियाँ और बहुएँ
सूप में
अपनी-अपनी
आयु के
दाने
बिन
रही
हैं।
सारे संसार की सभ्यताएँ दिन गिन रही हैं।
क्या मैं भी दिन गिनूँ?
अपने निरानंद में
रेंक और भाग और लीद रहे हैं गधे से
मैं पूछकर
आगे बढ़ जाता हूँ—
मगर ख़बरदार! मुझे कवि मत कहो।
मैं बकता नहीं हूँ कविताएँ
ईजाद करता हूँ
गाली
फिर उसे बुदबुदाता हूँ।
मैं कविताएँ बकता नहीं हूँ।
मैं थकता नहीं हूँ
कोसते।
सरदी में अपनी संतान को
केवल अपनी
हिम्मत की रज़ाई में लपेटकर
पोसते
ग़रीबों के मुहल्ले से निकलकर
मैं
एक बन्द नगर के दरवाज़े पर
खड़ा हूँ।
मैं कई साल से
पता नहीं अपनी या किसकी
शर्म में
गड़ा हूँ!
तुमने मेरी शर्म नहीं देखी!
मैं मात कर
सकता हूँ
महिलाओं को।
मैं जानता हूँ
सारी दुनिया के
बनबिलावों को
हमेशा से जो बैठे हैं
ताक में
काफ़ी दिनों से मैं
अनुभव करता हूँ तकलीफ़
अपनी
नाक में!
मुझे पैदा होना था अमीर घराने में।

अमीर घराने में
पैदा होने की यह आकांक्षा
साथ-साथ
बड़ी होती है।
हरेक मोड़ पर
प्रेमिका की तरह
मृत्यु
खड़ी होती है।

शरीरान्त के पहले मैं सबकुछ निचोड़कर उसको दे जाऊँगा जो भी मुझे मिलेगा। मैं यह अच्छी तरह जानता हूँ किसी के न होने से कुछ भी नहीं होता, मेरे न होने से कुछ भी नहीं हिलेगा। मेरे पास कुरसी भी नहीं जो ख़ाली हो। मनुष्य वकील हो, नेता हो, सन्त हो, मवाली हो—किसी के न होने से कुछ भी नहीं होता।

नाटक की समाप्ति पर
आँसू मत बहाओ।
रेल की खिड़की से
हाथ मत हिलाओ।

Book by Shrikant Verma:

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श्रीकान्त वर्मा
श्रीकांत वर्मा (18 सितम्बर 1931- 25 मई 1986) का जन्म बिलासपुर, छत्तीसगढ़ में हुआ। वे गीतकार, कथाकार तथा समीक्षक के रूप में जाने जाते हैं। ये राजनीति से भी जुड़े थे तथा राज्यसभा के सदस्य रहे। 1957 में प्रकाशित 'भटका मेघ', 1967 में प्रकाशित 'मायादर्पण' और 'दिनारम्भ', 1973 में प्रकाशित 'जलसाघर' और 1984 में प्रकाशित 'मगध' इनकी काव्य-कृतियाँ हैं। 'मगध' काव्य संग्रह के लिए 'साहित्य अकादमी पुरस्कार' से सम्मानित हुये।