शायद ऐसा ही हुआ होगा कभी-
सारी सतियों ने मिलजुल कर
किया होगा एक अनुसंधान
सतियों ने सर्वप्रथम
अपने सुहाग चिता से ‘राख’ ले ली होगी,
फिर सती-प्रथा जैसी कुप्रथा की
सारी ‘त्रुटियाँ’ लीं होंगी,

अपने ही स्वजनों द्वारा
सती बनाए जाने का ‘अन्याय’ लिया होगा,
जीवन को असमय त्यागने की
‘विवशता’ मिलायी होगी,
अपने प्रिय से बिछुड़न का
‘शोक’ लिया होगा,

और फिर इन सबको
अपनी सुहाग चिता पर झुलसे
रक्त में मिलाया होगा
फिर अपने अस्तित्व होम का
मंत्र पढ़ा होगा।

सतियों के सत-अनुष्ठान की
परिणति है – मेहँदी
जिसकी रक्तिम-आभा में
समाया हुआ सत-अनुष्ठान-
सभी सुहागिनों को,
शृंगार का साधन देकर
सदा-सुहाग का वर देकर
उन सतियों के विकल-वेदना से
अनभिज्ञता का
अभयदान देता है।

~:फिर लिखेंगे :~
नम्रता श्रीवास्तव