गाली-गलौज और धमकियों के बाद युवा क्लर्क को नौकरी छोड़नी पड़ी

'वीज़ा के लिए इंतज़ार' से संस्मरण | Memoir from 'Waiting for a Visa' by B. R. Ambedkar इस बात को आगे कहने के लिए यह...

महात्मन

ग़ुलाम देश देखा नहीं, न आज़ादी के मतवालों को देखा, शहीदों के ललाट पर लहू की लालिमा भी हम देख नहीं पाये और न...

मुझे विशालकाय बूढ़े दरख़्त हॉन्ट करते हैं

वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्यनारायण पर माधव राठौड़ का गद्य | Prose by Madhav Rathore about Dr. Satyanarayan मुझे विशालकाय बूढ़े दरख़्त हॉन्ट करते हैं, क्योंकि...

अंधविश्वास

'Andhvishwas', a memoir by Almas Ahmad "भईया इस तरफ़ से चढ़ना और सारी आम, जितनी मिलें, सब ख़त्म कर देना।" "ठीक है भईया जी।" "और हाँ! थोड़ा...

बुख़ारी साहब

'Bukhari Sahab', a Memoir (Sansmaran) by Faiz Ahmad Faiz ..."दोस्ती तनदिही और मुस्तैदी का नाम है यारो, मुहब्बत तो योंही कहने की बात है। देखो...

डॉक्टर ने समुचित इलाज से मना किया जिससे युवा स्त्री की...

यह घटना भी आँखें खोलने वाली है। यह घटना काठियावाड़ में एक गाँव की अछूत स्कूल में पढ़ाने वाली शिक्षिका की है। मिस्टर गांधी...

दौलताबाद के किले में पानी को दूषित करना

"पहले मैंने एक उदाहरण दिया था कि कैसे एक अछूत हिंदू पारसी के लिए भी अछूत होता है। जबकि यह उदाहरण दिखाता है कि कैसे एक अछूत हिंदू मुसलमान के लिए भी अछूत होता है।"

दोज़ख़ी

उर्दू के बेहतरीन संस्मरणों में से एक, इस्मत चुग़ताई अपने भाई और उर्दू लेखक अज़ीमबेग चुग़ताई को याद करते हुए! "बीवी शौहर न समझती, बच्चे बाप न समझते, बहन ने कह दिया, तुम मेरे भाई नहीं और भाई आवाज़ सुनकर नफ़रत से मुँह मोड़ लेते। माँ कहती- साँप जना था मैंने!" "विश्वास नहीं होता कि इस क़दर सूखा-मारा इन्सान, जिसने अपनी बीवी के अलावा किसी तरफ़ आँख उठाकर न देखा, कल्पना में कितना ऐयाश बन जाता है। ओफ़्फ़ोह!" "वो कहीं पर भी जायें, मैं देखना चाहती हूँ, क्या वहाँ भी उनकी वही कैंची-जैसी ज़बान चल रही है? क्या वहाँ भी वो हूरों से इश्क़ लड़ा रहे हैं या दोज़ख़ के फ़रिश्तों को जलाकर मुस्करा रहे हैं?"

चालिसगाँव में आत्मसम्मान, गँवारपन और गंभीर दुर्घटना

"मेरी शान के लिए चालिसगाँव के महार लोगों ने मेरी ज़िन्दगी दाँव पर लगा दी।"

मेरी पहली कविता

"मेरे फुफेरे भाई हुक्का पिया करते थे। सुबह-शाम जब भी मैं उनके पास जाता उन्हें हुक्का पीते पाता था। उनका कमरा तम्बाकू के धुएँ की नशीली गंध से भरा रहता था। उन्हें धुआँ उड़ाते देखकर तम्बाकू के धुएँ पर मैंने अनेक छन्द लिखे हैं।"

पश्चिम से लौटकर आने के बाद बड़ौदा में रहने की जगह...

"मेरी हालत इस कदर खराब थी कि जब मेरी बहन का बेटा बंबई से मेरा बचा हुआ सामान लेकर आया और उसने मेरी हालत देखी तो वह इतनी जोर-जोर से रोने लगा कि मुझे तुरंत उसे वापस भेजना पड़ा। इस हालत में मैं पारसी सराय में एक पारसी बन कर रहा।"

बचपन में दुस्वप्न बनी कोरेगाँव की यात्रा

हमारा परिवार मूल रूप से बांबे प्रसिडेंसी के रत्नागिरी जिले में स्थित डापोली तालुके का निवासी है। ईस्ट इंडिया कंपनी का राज शुरू होने...

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Corona, Covid

उसकी आँखें खुली रहनी चाहिए थीं

(कोरोना से गुज़र गई एक अपरिचित की फ़ेसबुक प्रोफ़ाइल से गुज़रते हुए) 8 मई, 2021 सत्ता है मछली की आँख और दोनों कर्ता-धर्ता अर्जुन और 'ठाकुर' बने थे चूक...
Usha Priyamvada

छुट्टी का दिन

पड़ोस के फ़्लैट में छोटे बच्चे के चीख़-चीख़कर रोने से माया की नींद टूट गई। उसने अलसाई पलकें खोलकर घड़ी देखी, पौने छह बजे...
Sudha Arora

अकेली औरत का हँसना

अकेली औरत ख़ुद से ख़ुद को छिपाती है। होंठों के बीच क़ैद पड़ी हँसी को खींचकर जबरन हँसती है और हँसी बीच रास्ते ही टूट जाती है... अकेली औरत...
Shamsher Bahadur Singh

चुका भी हूँ मैं नहीं

चुका भी हूँ मैं नहीं कहाँ किया मैनें प्रेम अभी। जब करूँगा प्रेम पिघल उठेंगे युगों के भूधर उफन उठेंगे सात सागर। किन्तु मैं हूँ मौन आज कहाँ सजे मैनें साज अभी। सरल से भी...
Franz Kafka, Milena Jesenska

मिलेना को लिखे काफ़्का के पत्रों के कुछ अंश

किताब अंश: 'लेटर्स टू मिलेना' अनुवाद: लाखन सिंह प्रिय मिलेना, काश! ऐसा हो कि दुनिया कल ख़त्म हो जाए। तब मैं अगली ही ट्रेन पकड़, वियना में...
Woman in front of a door

सुबह

कितना सुन्दर है सुबह का काँच के शीशों से झाँकना इसी ललछौंहे अनछुए स्पर्श से जागती रही हूँ मैं बचपन का अभ्यास इतना सध गया है कि आँखें खुल ही जाती...
Rohit Thakur

सोलेस इन मे

कौन आएगा मई में सांत्वना देने कोई नहीं आएगा समय ने मृत्यु का स्वांग रचा है अगर कोई न आए तो बारिश तुम आना आँसुओं की तरह दो-चार बूँदों की...
Fist, Protest, Dissent

एक छोटी-सी लड़ाई

मुझे लड़नी है एक छोटी-सी लड़ाई एक झूठी लड़ाई में मैं इतना थक गया हूँ कि किसी बड़ी लड़ाई के क़ाबिल नहीं रहा। मुझे लड़ना नहीं अब— किसी...
Saadat Hasan Manto

मंटो

मंटो के मुताल्लिक़ अब तक बहुत कुछ लिखा और कहा जा चुका है। उसके हक़ में कम और ‎ख़िलाफ़ ज़्यादा। ये तहरीरें अगर पेश-ए-नज़र...
Sahir Ludhianvi

ख़ून फिर ख़ून है

ज़ुल्म फिर ज़ुल्म है, बढ़ता है तो मिट जाता है ख़ून फिर ख़ून है, टपकेगा तो जम जाएगा ख़ाक-ए-सहरा पे जमे या कफ़-ए-क़ातिल पे जमे फ़र्क़-ए-इंसाफ़ पे...
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