‘Mere Aatmvishwas Ki Bel’, a poem by Ruchi

मेरे आत्मविश्वास की बेल बढ़ चली थी,
तुम्हारे अटूट विश्वास के तने पर।
मैंने पाया तुम जब तक मुझसे अविश्वसनीय प्रेम करते रहे,
मैंने अदम्य विश्वास किया ख़ुद पर।

तुम्हारे प्रेम ने मुझे बेबाक किया,
मैं खिलखिला पड़ती थी अक्सर भीड़ में,
कभी झूमती लिपटने को क़दम बढ़ा देती तुम्हारी ओर,
मेरी आँखों के सभी मंज़र इर्द-गिर्द थे तुम्हारे।

मैंने तुम्हारे प्रेम में ही सीखा स्नेह की मात्राएँ,
हर जाने अनजाने की ओर उछाल देती थी,
एक उपयुक्त मात्रा स्नेह की, स्नेहवश।
तुमने मुझे स्नेह की मात्राएँ सिखायीं, मैंने रचा स्नेह कोश।

मुझे कभी भय न लगा किसी पुरुष को कहते हुए-
“आज जँच रहे हो, तुम्हारी आँखें बहुत ख़ूबसूरत हैं।”
पता है क्यों? क्योंकि मेरी जड़ें तुमसे लिपटी थीं,
आत्मविश्वास की बेल पनप उठी थी विश्वास के तने से मीलों ऊपर।

विश्वास का तना अदृश्य हो गया,
आत्मविश्वास की बेलों के मध्य,
ख़ूबसूरती दर्शनीय थी घनी बेलों की,
कि तभी तने ने खोदकर जड़ें अपनी, ख़ुद को महसूस किया।

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