‘Mere Hone, Na Hone Ke Beech’, a poem by Nirmal Gupt

मैं जा रहा अकेला कुछ बुदबुदाता हुआ
न.. न.. कोई दुआ नहीं
न किसी फ़र्ज़ी उम्मीद की मुनादी
उसमें जो था
समझ से ज़रा फ़ासले पर रहा
दिल को बहलाने को तब मैंने शायद
अजब भाषाई ढोंग रच लिया

मेरे पास अरसे से
कहने-सुनने को कुछ ख़ास है नहीं
बासी शब्दों से कोई क्या रचे
उनसे रची इबारत में से तो
आती है वनैली गन्ध
अभिव्यक्ति के सिर पर
उग आए हैं नुकीले सींग

हमारे समय के कवि के पास
कविताओं की जगह जटिल पहेलियाँ हैं,
जग को भरमाने के लिए है
कृत्रिम शब्दावली,
कुछ भी लिखने से पहले
कलम की आड़ में मुँह छुपाते हैं,
उनकी बेहयाई कालजयी है

लिखना-पढ़ना उनके लिए ऐसा
ख़ुद को ज़िंदा जताने के लिए
गहरी नींद में पलक झपकाना,
बताते चलना देश दुनिया को
हम इस ठहरे समय में निरे निठल्ले नहीं
कुछ न कुछ कर रहे यक़ीनन

सब ठीक है, ठीक-ठाक है लगभग
इसी होने, न होने के बीच
सिर्फ़ निरर्थक बहस मुबाहिसे हैं
चन्द फ़ैशनेबल जुमले
कुछ खोखले लफ़्ज़
चतुदिक वैचारिक घपले हैं…

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निर्मल गुप्त
बंगाल में जन्म ,रहना सहना उत्तर प्रदेश के मेरठ में . व्यंग्य लेखन भी .अब तक कविता की दो किताबें -मैं ज़रा जल्दी में हूँ और वक्त का अजायबघर छप चुकी हैं . दो व्यंग्य लेखों के संकलन इस बहुरुपिया समय में तथा हैंगर में टंगा एंगर प्रकाशित. कुछ कहानियों और कविताओं का अंग्रेजी तथा अन्य भाषाओं में अनुवाद . सम्पर्क : [email protected]

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