सोच रही हूँ एक कविता लिखूँ
और शृंगार करूँ उसका,
सीधी, सरल, प्रपंचहीन
जो हृदय में उतरते ही
रसहीन हृदय को भी सरस बना दे।
तुम्हारे शृंगार में आभूषणों का बोझ न होगा,
होगी तो बस तुम्हारे अंतर्मन में निहित सुंदरता
जो तुम्हारे चेहरे पर तेज बनकर
कांतिमय कर देगी
एक कोरे कागज को,
विशेषणों के बोझ से तो
ऐसी दुल्हन बन जाओगी तुम
जिसकी सुंदरता आभूषणों के पीछे छिप जाती है।
अलंकार रहित सौंदर्य तुम्हारा
ज़्यादा आकर्षक लगेगा
और उभर कर आएगी कांति तुम्हारी।
या फिर
पुष्पों से कर दूँगी सजावट तुम्हारी
और घुल जाएगी तुममें
मिट्टी और पुष्प की
घुली-मिली सौंधी सुगंध,
जिसे हृदय तक पहुचनें में
कम वक्त का सफर तय करना पड़ेगा।

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अनुपमा मिश्रा
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