‘बद अच्छा, बदनाम बुरा।’

कवि, लेखक और दार्शनिक प्रायः इस बात के लिए बदनाम हैं कि वे कल्पना के आकाश में विचरा करते हैं; उनके पैर चाहे जमीन पर रहें, किन्तु निगाह आसमान की ओर रहती है और वे झोंपड़ियों में रहकर भी ख्वाब महलों का देखा करते हैं। न्यायशास्त्र के कर्ता अक्षपाद गौतम एक दिन विचार करते-करते एक गड्ढे में गिर पड़े थे। भगवान् ने दया करके उनके पैरों में आँखें दे दी थीं, इसलिए कि वे ऊपर को आँख किये हुए भी पैरों के पास के गड्ढों और काँटों को देख सकें। तभी से उनका नाम अक्षपाद हो गया।

आजकल के दार्शनिकों को ईश्वर में विश्वास नहीं, नहीं तो शायद् उनके पैरों में भी आँखों के जोड़े निकल आते। आजकल पैरों की तो क्या सर की आँखों के भी लाले पड़े रहते हैं। अक्षपाद तो अतीत काल की विभूति थे। किन्तु आधुनिक काल में भी कुछ लोग अवश्य अपने चरित्र से दुनिया की धारणा को सार्थक करते रहते हैं। वास्तव में कोई वर्ग अकारण बदनाम नहीं होता। ऐसे लोग दीन-दुनिया से बेखबर रहकर तीनों लोकों से न्यारी अपनी मथुरा बसाया करते हैं और कविवर ‘अकबर’ के शब्दों में सारी उम्र होटलों में गुजार (बढ़िया होटलों में नहीं), मरने को अस्पताल चले जाते हैं। इनमें से कुछ लोग तो ऐसे होते हैं जिनका अन्तः (घर) और बाह्य (सामाजिक जीवन) एक सा है। उनको न बच्चों की टें-टें-पे-पें से काम और न दुनिया के करुण-क्रन्दन से मतलब; क्वेटा का भूकम्प हो और चाहे बंगाल का दुर्भिक्ष, राष्ट्र बिगड़े या बने, उनको अपने सोटे-लँगोटे में मस्त पड़े रहना; न वे ऊधो के लेने में रहते हैं और न माधो के देने में। वे अपनी कल्पना के कल्पतरु के नीचे बैठकर अपनी विश्वामित्री सृष्टि रचा करते हैं; सो भी जब मौज आई, नहीं तो वे कल्पना का भी कष्ट नहीं करते।

कुछ लोग ऐसे है जिनको घर की तो परवाह नहीं, बच्चों के लिए दवा हो या न हो, घर में चूहे नहीं आदमी भी एकादशी करते हों, स्त्री बेचारी नैयायिकों के अनुमान के प्रत्यक्ष आधारस्वरूप आद्रेन्धन (गीले ईन्धन) और अग्नि के संयोग से उत्पन्न धुएँ से अग्निहोत्री ऋषियों की भाँति आरक्त-लोचन (धुएँ के अतिरिक्त क्रोध से भी) बनी रहती हो, किन्तु उन्हें सभाओं के संचालन और नेतापन से काम। घर में उनके पैर, जाल में पड़ी हुई मछली की भाँति, फदफदाया करते हैं किन्तु बलिहारी कन्ट्रोल की कि उनको भी आटे-दाल का भाव आलङ्कारिक रूप से नहीं बल्कि उसके शब्दार्थ में भी मालूम पड़ गया है। मेरे एक दार्शनिक मित्र (श्री पी. एम. भम्भानी) उस रोज शक्कर का पारिवारिक अर्थशास्त्र बतला रहे थे। मुझे उन्हें चीनी की समस्या से विचलित होते देखकर आश्चर्य हुआ। उन्होने कहा- भाई, यह कंट्रोल मुझे भी आसमान से नीचे उतार लाया और मैं भी अब नौन-तेल-लकड़ी के चक्कर में पड़ गया हूँ। (ईश्वर को धन्यवाद है कि अब कन्ट्रोल की बाधा नहीं रही।)

मैं कभी-कभी उपर्युक्त गृहत्यागी वर्ग की गगनचुम्बिनी सीमा को स्पर्श कर लेता हूँ किन्तु पारिवारिकता के क्षेत्र से बाहर नहीं आ सका हूँ। पारिवारिक जीवन में सामाजिक जीवन का समन्वय करना कभी-कभी बड़ी समस्या हो जाता है। ऐसा हाल प्रायः बहुत से लेखकों का होगा। परिवार में जन्म लेकर उसकी उपेक्षा नहीं कर सकता। कुछ लोग परिवार में जन्म लेते हैं किन्तु परिवार बनाने का पाप अपने ऊपर नहीं लेते है। ऐसे व्यक्ति यदि वे अगला जन्म धारण करेंगे तो टेस्ट-ट्यूब बेबीज के रूप में प्रकट होंगे। विज्ञान और समाजशास्त्र निष्पारिवारिकता की ओर जा रहा है, किन्तु हम लोग भारतीय संस्कृति के बन्धन में पले हैं, पारिवारिकता के बन्धन से बाहर नहीं जा सकते हैं- उसमें गुण भी हैं और दोष भी। शुद्ध दूध में भी तो 60 प्रतिशत से अधिक पानी होता है। उस पानी के बिना शायद वह दूध हज्म भी न हो।

पाप-पुण्य, दिन-रात की भाँति पारिवारिक जीवन भी गुण-दोषमय है। दोषों की मैं कमी अवश्य चाहता हूँ किन्तु उस वैद्य की भाँति नहीं हूँ जो ऐसी दवा दे जिससे न मर्ज रहे और न मरीज। अस्तु, इसी पारिवारिकता-पारायण और सामाजिकता के लिए मनोरथशील कछुए जैसे मुझ उभयजीवी प्राणी की दैनिकी का एक पृष्ठ पढ़ने की पाठकगण कृपा करेंगे।

तारीख 21 सितम्बर सन् 1945 (केवल यही पृष्ठ लिखकर मैं घबड़ा गया था, वास्तविकता की पुनरावृत्ति मैं नहीं चाहता हूँ)।

प्रातःकाल 4 बजे (लिनलिथगो टाइम से) उठा। अपनी ‘सिद्धान्त और अध्ययन’ शीर्षक पुस्तक के लिए 6 बजे तक पढ़ा। (मैं उन लोगों में से हूँ जो अपने विशेष निबन्धों के लिए बिना कुछ पढ़े नहीं लिख सकते। वास्तव में मेरे लेखन में एक तिहाई दूसरे से पढ़ा होता है, एक बटा छह उसके आधार से स्वयं प्रकाशित और ध्वनित विचार होते हैं, एक बटा छह सप्रयत्न सोचे हुए विचार रहते हैं और एक तिहाई मलाई के लड्डू की बर्फी बना कर चोरी को छिपाने वाली अभिव्यक्ति की कला रहती है।) 6 से सवा 6 तक कागज कलम सियाही जुटाने में खर्च किया। आठ बजे मध्ये-मध्ये आचमनीयम् तथा पुङ्गीफल खण्डों के विराम चिह्नों सहित लिखा।

6 बजे तैयार होकर प्रूफ की तलाश में प्रेस गया; अक्षर भगवान् को छछिया भर छाछ की बजाय वेलन के बल, जगत् की कालिमा मिलाकर उँगलियों पर नाच नचाने वाले कम्पोजीटर देव की अनुपस्थिति में ‘कॉपी’ में काट-छाँट की और प्रूफ में भी घटाया-बढ़ाया। इस प्रकार उनकी झूँझल का सामान कर बाजार गया। वहाँ पहुँचते ही शेखर के अन्तिम दिन की भाँति स्मृति के तार झंकृत हो उठे और घर के सारे अभावों का ध्यान आ गया। किन्तु बाजार में कोई स्थान नहीं है जहाँ सब अभावों की एक साथ पूर्ति हो जाय। अगर अच्छा साबुन राजामंडी मे मिलता है तो अच्छा मसाला राबतपाड़े में। किन्तु वहाँ भैंस के लिए भुस का अभाव था। बाल-बच्चों की दवा के बाद अगर किसी वस्तु को मुख्यता मिलती है तो भैंस के भुस को, क्योंकि उसके बिना काले अक्षरों की सृष्टि नहीं हो सकती। मेरी काली भैंस धवल दुग्ध का ही सृजन नहीं करती, वरन् उसके सदृश ही धवल यश के सृजन में भी सहायक होती है। इस गुण के होते हुए भी वह मेरे जीवन की एक बड़ी समस्या हो गई है। मैं हर साल उसके लिए अपने घर के पास के खेत में चरी कर लेता था। इस साल वर्षा के होते हुए भी मेरे यहाँ चरी नही हुई ‘भाग्यं फलति सर्वत्र, न विद्या, न च पौरुष’ – मेरे पड़ोसी के ईर्ष्याजनक लहलहाती खेती है। मेरी भैंस को उस खेती से ईर्ष्या नहीं वरन् सच्चा अनुराग है, वह सच्चे भक्तों की भाँति गृह-बन्धनों को तोड़कर अपने प्रेम का आक्रमण कर देती है। जितना वे उसे भगाते है उतनी ही उनकी चरी रौंधी जाती है और जितनी उनकी चरी रौंधी जाती है उससे अधिक उनका दिल दुखता है। मालूम नहीं इसको अलङ्कार शास्त्र में असंगति कहते हैं या और कुछ। घाव लक्ष्मणजी के हृदय में था और पीर रघुवीर के हृदय में, वैसे ही रौंधी चरी जाती थी और दुःख मेरे पड़ोसी महोदय के हृदय में होता था।

मैं संघर्ष में पड़ता नहीं, किन्तु कभी-कभी इच्छा न रखते हुए भी संघर्ष बड़ा तीव्र हो जाता है। बच्चों के दूध और पड़ोसी के साथ सद्भावना में ऐसा अन्तर्द्वन्द्व उपस्थित हो जाता है जो शायद प्रसाद के नाटकों में भी सहज ही न मिले। खैर, आजकल उसका दूध कम हो जाने पर भी और अपने मित्रों को छाछ भी न पिला सकने की विवशता की झूंझल के होते हुए भी (सुरराज इन्द्र की तरह मुझे भी मठा दुर्लभ हो गया है। तक्रं शक्रस्य दुर्लभम्) उसके लिए भुस लाना अनिवार्य हो जाता है। कहाँ साधारणीकरण और अभिव्यञ्जनावाद की चर्चा और कहाँ भुस का भाव? भुस खरीदकर मुझे भी गधे के पीछे ऐसे ही चलना पड़ता है, जैसे बहुत से लोग अकल के पीछे लाठी लेकर चलते हैं। कभी-कभी गधे के साथ कदम मिलाये रखना कठिन हो जाता है, (प्रगतिशीलता में वह मुझसे चार कदम आगे रहता है) लेकिन मुझे गधे के पीछे चलने में उतना ही आनन्द आता है जितना कि पलायनवादी को जीवन से भागने में। बहुत से लोग तो जीवन से छुट्टी पाने के लिए कला का अनुसरण करते हैं किन्तु मैं कला से छुट्टी पाने के लिए जीवन में प्रवेश करता हूँ।

11 बजे बाजार हाट से भैंस के लिए भुस और अपने लिए शाकभाजी लेकर लौटा, स्नान किये, भोजन किया, और करीब-करीब 12 बजे कालेज पहुँचा। लड़कों को पढ़ाया या बहकाया– मैं गलत पढ़ाने का पाप नहीं करता किन्तु जो मुझे नहीं आता उसे कभी-कभी कौशल के साथ छोड़ देता हूँ। यदि कोई छंद इम्तहान में आने लायक हुआ तो मैं बेईमानी नहीं करता। अपनी अज्ञता सह-स्वीकार कर लेता हूँ।

कालेज की लाइब्रेरी से कुछ पुस्तकें ली और फिर ‘साहित्यसंदेश’ के दफ्तर आया। वहाँ जलपान किया, जल पीकर पान खाया; कभी-कभी रूढ़ि अर्थ में भी जलपान करता हूँ और कभी शुद्ध अभिधार्थ में जल का पान करता हूँ। कम्पोजीटर की शिकायत सुनी, दीन शराबी की सी तोबा की कि अब न घटाऊँगा बढ़ाऊँगा। आप लोगों को कष्ट अवश्य होता है। उनकी अनुनय-विनय की (‘अब लौ नसानी अब न नसै हौ’)। किन्तु क्या करूँ आदत से मजबूर हूँ। बनियों की पाछिल बुद्धि होती है, लिखने के बाद कहीं प्रूफ पढ़ने पर ही शोधन सूझते हैं। पूर्फ पढ़े। कम्पोजीटरों से बढ़कर स्वयं झूंझल का शिकार बना।

४ बजे घर लौटा। अभावों की नई गाथा सुनी; घर की भूली हुई समस्याएँ सामने आईं। खूँटा उखाड़कर भैंस भाग गई थी, उसकी साँकल किसी ने उतार ली है; क्या फिर दुबारा बाजार जाऊँ? इसी संकल्प-विकल्प में दुग्धपान किया। रात्रि में जल के मार्जन और आचमन से निद्रा देवी का जो तिरस्कार किया था, उसका प्रायश्चित किया। उठकर भाई को पत्र लिखा। रमणीयता के सम्बन्ध में हमारे यहाँ कहा गया है: ‘क्षणेक्षणे यन्नवतामुपैति तदेव रूपं रमणीयतायाः’ अर्थात् जो क्षण-क्षण में नवीनता धारण करे वही रमणीय है। मेरी घरेलू समस्याएँ मेरी कल्पना से भी चार कदम आगे रहती हैं। फिर मैं उनको सुन्दर क्यों न कहूँ। शास्त्रीय परिभाषा के बाहर मैं नहीं जा सकता।

आज किसी ने भैंस की जंजीर चुरा ली तो कल पढ़िया ने खेत खा लिया। मेरी शान्ति के भंग करने के लिए एक नया एटम बम रोज तैयार रहता है। किसी को बुखार आ गया तो किसी के दाँत में दर्द है। कभी चीनी वर्षाकालीन नदी की भाँति राशन की मर्यादा को पार कर गयी तो कभी कपड़ों की चर्चा। सर्वोपरि, लड़ाई के दिनों में सुरसा के मुख की भाँति बढ़ते हुए खर्च के अस्तित्व में, कलियुग में श्रद्धा की भाँति घटते हुए बैंक शेषों को बौद्धों के परम तत्व (शुन्य) की गति से बचाने की फिक्र। धन भी हो तो वस्तु का अभाव। कपड़ों के सम्बन्ध में डिरिट्रक्ट सप्लाई ऑफिसर से मिलने का संकल्प किया, घर में इधर-उधर का वार्तालाप।

सायंकाल को अपने पड़ोसी द्विवेदी के यहाँ बैठकर स्त्रियों के वेदाध्ययन के अधिकार पर चर्चा की। ( यद्यपि मेरे घर में किसी के वेद पढ़ने की आशंका नहीं, फिर भी शहर के अन्देशे से परेशान होने में कुछ ट्रेजडी के पढ़ने का सा आनन्द आता है।) मैंने कहा कि जब स्त्रियों में मंत्रद्रष्टा है तो उनको वेदों के पढ़ने का अधिकार क्यों नहीं? उन्होंने कहा जो शास्त्र में लिखा है वह लिखा है, उसमें संगति लगाने और तर्क उठाने की गुञ्जाइश नही। विचारों में घोर मतभेद होते हुए भी वार्तालाप कटुता की सीमा तक नहीं पहुँचता। और मैं उनके यहाँ बैठकर ‘काव्यशास्त्र विनोदेन कालोगच्छति धीमताम’ की उक्ति को सार्थक करता रहता हूँ। रात को सवेरे की साहित्यिक चोरी के लिए कुछ पढ़ा, बच्चों से वार्तालाप किया। कुछ मनोविनोद हुआ।

कभी-कभी जब वे करुण, रौद्र या वीर रस का लौकिक प्रदर्शन करने लगते हैं तब मुझे प्रसाद की निम्नलिखित पंक्तियों की सार्थकता समझ में आने लगती है-

ले चल वहाँ भुलावा देकर,
मेरे नाविक धीरे-धीरे;
जिस निर्जन में सागर लहरी
अम्बर के कानों में गहरी
निश्छल प्रेम-कथा कहती हो,
तज कोलाहल की अवनी रे।

बच्चों को मैं पढ़ाता बहुत कम हूँ। यहाँ तक कि मेरे बच्चे भी मुझ पर इस बात का व्यंग करने लगते हैं। मेरे एक शिष्य प्रवर ने (जब आचार्य प्रवर कहलाते हैं, तो शिष्य प्रवर भी कहलाने चाहिये) किसी प्रसंग में कहा- हम तो आपके बच्चे हैं, आपका आशीर्वाद चाहिये। मेरे कनिष्ठ पुत्र विनोद ने, जिसकी आयु प्रायः बारह साल की है, तुरन्त उत्तर दिया, “आप अगर बाबूजी के बच्चे बनेंगे तो वे आपको पढ़ाना छोड़ देंगे क्योंकि आप बच्चों को नहीं पढ़ाते हैं।”

यही मेरे पारिवारिक जीवन की कमी है। वैसे इन झंझटों के होते हुए भी अत्यन्त सुखी हूँ। चारों ओर अनुकूलता और आज्ञाकारिता है। मैं हृदय की सचाई से कह सकता हूँ कि जन्म-जन्मान्तर में भी मेरा जन्म इसी परिवार में हो। मैं मोक्ष के लिए उत्सुक नहीं हूँ।

नोट- इस दिनचर्या में थोड़ा परिवर्तन हो गया है। भैंस के प्रति तुलसीदास जी का सा अनन्य भाव रखते हुए भी अब भैंस के स्थान पर गाय पाल ली है। समस्याएँ तो करीब-करीब वे ही हैं। आजकल मेरे पड़ोसी के यहाँ घास अच्छी है- वैसे भी पराई पत्तल का भात अच्छा लगता है—उस पर आक्रमण होता है । समय मिलने पर मैं रघुवंश (2 । 5) मे वर्णित महाराज दिलीप के पूरे कार्यक्रम का अनुकरण करता हूँ- ‘आस्वादवद्भिः कवलैस्तृणानां कण्डूयनैर्दशनिवारणैश्च’ अर्थात् घास के सुस्वादु ग्रासो से, खुजलाने से और डॉस उड़ाने से मैं उसे प्रसन्न करना चाहता हूँ; केवल एक बात की कसर रह जाती है— मैं उसकी अव्याहत स्वच्छन्द गति में सहायक नहीं हूँ और यह नहीं कह सकता ‘अव्याहतैः स्वैरगतैः’ क्योंकि उसके स्वच्छन्द विचरण में पड़ोसियों के विनम्र परन्तु तीखे उपालम्भों का भय रहता है। मैं यदि सम्राट् होता तो उसकी अबाधित गति पर आक्षेप करने का किसी को साहस न होता। भुस के लिए मुझे अब बाजार नहीं जाना पड़ता। बाजार हाट का बहुत सा काम अब मेरा कनिष्ठ पुत्र विनोद कर लेता है। कम्पोजीटर अब भी मुझसे परेशान हैं।

[‘मेरी असफलताएँ’]

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बाबू गुलाब राय
बाबू गुलाबराय (१७ जनवरी १८८८ - १३ अप्रैल १९६३) हिन्दी के आलोचक तथा निबन्धकार थे। गुलाब राय जी की रचनाएँ दो प्रकार की हैं- दार्शनिक और साहित्यिक। गुलाब राय जी की दार्शनिक रचनाएँ उनके गंभीर अध्ययन और चिंतन का परिणाम है। उन्होंने सर्व प्रथम हिंदी को अपने दार्शनिक विचारों का दान दिया। उनसे पूर्व हिंदी में इस विषय का सर्वथा अभाव था। गुलाबराय जी की साहित्यिक रचनाओं के अंतर्गत उनके आलोचनात्मक निबंध आते हैं।