‘Meri Kavita Poori Hogi Na’, a poem by Sudhanshu Raghuvanshi

मैं सीखता हूँ हर एक चीज़ से
पता नहीं,
सही या ग़लत!
मैंने सीखा है कविता पढ़ते हुए,
कविता लिखते समय-
‘धैर्य रखना’
मैंने शुरुआत कीं लिखनी
कई कविताएं!

ये पूरी होंगी

जब
कोयल, जो वर्षों से आम के पेड़ से शीशम तक उड़ती है,
जाने किसे खोजती है?
बना लेगी अपना घोंसला!

जब
सूरज धरती के लिये पश्चिम से उगेगा

जब
क्षितिज,
मेरी स्याही से निकलकर
उभर आएगा वास्तव में
यहीं कहीं या दूर

किंतु रुको!
क्षण भर रुको
ये सब तो असम्भाव्य हैं!

मैंने प्रारंभ किया था लिखना,
एक और कविता..
तुम्हारे साथ होने पर

मेरी कविता का ‘धैर्य’ आज
‘जीवन भर की प्रतीक्षा’ हो गया है।

मेरी कविता पूरी होगी न!

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