मेरी माँ

माँ थी जब
आँखों में आने से पहले ही
पढ़ लेती थी
शब्द, सपने
यहाँ तक कि आँसू भी
दरवाजे तक पँहुचने के पहले
दस्तक देते थे मेरे जज़्बात
मेरी खुशबू
मेरे पैरों की रफ़्तार से
भाँप लेती थी मन
माँ थी जब
मेरी छोटी होती हुई फ्रॉक को
मिलते हुए रँग के कपड़े लगा
मिला देती थी मेरी लम्बाई से!
उधेड़ कर पुराने स्वेटर
नए रँग मिला नया बना देती थी
सहेज कर रखी साड़ियों से
नए परिधान बना
परी सा सजा मुझे,
लगा देती थी काला टीका!
माँ थी जब-
बचपन था
जवानी थी
रूठना आता था मुझे
अपने थे सारे रिश्ते
और
महक थी मायके में ममता की
जादूगर थी माँ!
जो पुरानी पड़ती हर चीज़ को
नया कर देती थी।

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