मिलना तो मन का होता है, तन की क्या दरकार बटोही

जो मिलकर भी मिल न सके हों
सोचो तो उनकी मजबूरी,
धन्यवाद उसको जिसने की
और अधिक मंज़िल की दूरी।

शायद तुम इस पथ पर आए, पहली-पहली बार बटोही
मिलना तो मन का होता है, तन की क्या दरकार बटोही

तन का क्या, माटी की महिमा
मन चाहे कंचन बतला दो,
मन का क्या, पिंजरे का पंछी
जो सुनना चाहो सिखला दो।

माथे के श्रम सीकर लेकर, सबके चरण पखार बटोही
मिलना तो मन का होता है, तन की क्या दरकार बटोही

सुमन मिले ऐसे मनमौजी
जो शूलों-सी चुभन दे गए,
शूल मिले ऐसे अनचाहे
जो जीवन-रस-गन्ध ले गए।

मेरे दुर्बल मन ने माना, उन सबका आभार बटोही
मिलना तो मन का होता है, तन की क्या दरकार बटोही

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बलबीर सिंह 'रंग'
बलबीर सिंह 'रंग' एक भारतीय हिंदी कवि थे। वे अधिकतर कवितायेँ किसानों की स्थिति पर लिखा करते थे। उन्होंने अपनी कविताओं में भारतीय किसानो की स्थिति का सही वर्णन किया है।

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