कैसे करूँ

हर मौसम तेरी यादों का मौसम लगता है मैं तुझसे बचना चाहूँ भी तो कैसे तन्हाइयों में भी हरदम हमराह तू ही होता है तेरे साये से...

मोहब्बत देखूं

तेरी याद में मैं खुद को बिखरा इस तरह देखूँ पतझड़ में पेड़ की पत्ती का पेड़ से विरह देखूं ।। आ दौड़ के और भर...

ज़ीस्त ये कैसी जंजाल में है

ज़ीस्त ये कैसी जंजाल में है चलना इसे हर हाल में है माज़ी के पीछे चलने वाले हाल तेरा किस हाल में है जवाब छोड़ तो आये हो...

अँधेरा

आदत हो गयी है मुझको, अब तो अंधरे में रहने की बुझा देता हूँ चराग, डर लगने लगा अब तो उजाले से निकल आता है खुर्शीद...

आगोश

ज़र प्रेम के बाद तुम्हारे आगोश में सिमटकर मासूमियत से सो जाना , जैसे किसी प्रेम पगी कविता की असाधारण अन्तिम पँक्ति लिखना। - निधि...

दो दुनिया का फासला

"सुबह के पौने ग्यारह बजे रोड-रैश खेलते हुए आता विक्रम ऑटो पकड़ती हूँ और ड्राइवर सीट के पिछले हिस्से से सटी सीट पर टिक जाती हूँ।  टिकना यहाँ उपयुक्त शब्द है क्योंकि ग़ाज़ियाबाद के ऑटो में 'बैठने' की लक्ज़री तो किस्मत वालों को मिलती है। बहरहाल, आधा ध्यान घड़ी की सुई पर है और आधा सामने लगे लाल-हरी चोली का एक सिरा मुँह में दबाये लड़की के चित्र पर। नीचे लिखा है - 'सिर्फ तुम'।"

मदहोशी

चलते चलते मुझे लगा कि मैं गलत आ गया हूँ एक व्यक्ति से रास्ता पूछा उसने कोई तवज्जो नहीं दी पास में ही शराब की दुकान थी एक सज्जन...

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