यह समूची दुनिया नास्तिक हो जाए

'Yah Samoochi Duniya Nastik Ho Jae' by Pallavi Vinod "तो तुम्हारे हिसाब से ज़िन्दगी के कुछ निश्चित सूत्र होते हैं, ज़िन्दगी उन्हीं में ढली होती...

तुम्हारी याद

कल जो अपनी यादों की अलमारी झाड़ रहा था, एक कोने में तुम्हारी याद मिल गयी। जैसे शांत समुन्दर में अचानक उफ़ान आया हो,...

तुम मिलो मुझे

तुम मिलो मुझे समंदर की गीली रेत पर बनाते अपने पैरों के निशाँ... मैं मिलूंगा तुम्हें समंदर की उसी गीली रेत पर बनाते तुम्हारे पैरों पे अपने...

रास्ते और मेरा सफर

मैं खुद को ही मंजिल मानकर चलता रहा अनजानी राहों पर, कुछ देर चलने के बाद मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ तो गहरा शून्य...

घर में घर का निशाँ ढूँढता हूँ।

छत तो है बस मकाँ ढूँढता हूँ घर में घर का निशाँ ढूँढता हूँ। जमीं पे सबका हक़ है अपना अपना अब तो रहने को आसमाँ ढूँढता...

कैसे करूँ

हर मौसम तेरी यादों का मौसम लगता है मैं तुझसे बचना चाहूँ भी तो कैसे तन्हाइयों में भी हरदम हमराह तू ही होता है तेरे साये से...

मोहब्बत देखूं

तेरी याद में मैं खुद को बिखरा इस तरह देखूँ पतझड़ में पेड़ की पत्ती का पेड़ से विरह देखूं ।। आ दौड़ के और भर...

ज़ीस्त ये कैसी जंजाल में है

ज़ीस्त ये कैसी जंजाल में है चलना इसे हर हाल में है माज़ी के पीछे चलने वाले हाल तेरा किस हाल में है जवाब छोड़ तो आये हो...

अँधेरा

आदत हो गयी है मुझको, अब तो अंधरे में रहने की बुझा देता हूँ चराग, डर लगने लगा अब तो उजाले से निकल आता है खुर्शीद...

आगोश

ज़र प्रेम के बाद तुम्हारे आगोश में सिमटकर मासूमियत से सो जाना , जैसे किसी प्रेम पगी कविता की असाधारण अन्तिम पँक्ति लिखना। - निधि...

दो दुनिया का फासला

"सुबह के पौने ग्यारह बजे रोड-रैश खेलते हुए आता विक्रम ऑटो पकड़ती हूँ और ड्राइवर सीट के पिछले हिस्से से सटी सीट पर टिक जाती हूँ।  टिकना यहाँ उपयुक्त शब्द है क्योंकि ग़ाज़ियाबाद के ऑटो में 'बैठने' की लक्ज़री तो किस्मत वालों को मिलती है। बहरहाल, आधा ध्यान घड़ी की सुई पर है और आधा सामने लगे लाल-हरी चोली का एक सिरा मुँह में दबाये लड़की के चित्र पर। नीचे लिखा है - 'सिर्फ तुम'।"

मदहोशी

चलते चलते मुझे लगा कि मैं गलत आ गया हूँ एक व्यक्ति से रास्ता पूछा उसने कोई तवज्जो नहीं दी पास में ही शराब की दुकान थी एक सज्जन...

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उसका होना

उसके नाम की प्रतिध्वनि किसी स्पन्दन की तरह मन की घाटी में गहरी छुपी रही और मैं एक दारुण हिज्र जीती रही वेदना, व्याकुलता के मनोवेगों में त्वरित बिजुरी की...
Do Log - Gulzar

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लुचिल्ला त्रपैज़ो स्विस इतालवी कवयित्री हैं। उनके चार कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं और उनकी रचनाएँ कई भाषाओं में अनूदित भी हो चुकी...
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