राधेश्याम सोनी की कहानी ‘मिस कॉल’ | ‘Miss Call’, a story by Radheshyam Soni

ट्रिन-ट्रिन… ट्रिन-ट्रिन…, टेलीफ़ोन की घण्टी दो बार बज चुकी थी। रामजी लाल ने बाथरूम से ही ज़ोर से आवाज़ लगायी।

“अरे बहरी हो क्या? फ़ोन की घण्टी बज रही है, उठाती क्यों नहीं?”

तब तक फ़ोन की घण्टी बंद हो चुकी थी। रामजी लाल बड़बड़ाते हुए बाथरूम से निकले और अंजलि से मुख़ातिब होकर बोले, “अरे फ़ोन क्यूँ नहीं उठाया। आज वीकेंड है, ना जाने कब गुड्डू का फ़ोन आ जाए। तुम इतनी क्या बिज़ी थीं कि एक फ़ोन भी नहीं उठा सकतीं।”

रामजी लाल टीवी की आवाज़ कम करते हुए बोले, “हज़ार बार कहा है कि टीवी धीमी आवाज़ में चलाया करो, टेलीफ़ोन की घण्टी सुनायी नहीं पड़ती। हमेशा टीवी से चिपकी रहा करो। अब ना जाने कब फिर फ़ोन आएगा। कितनी देर से फ़ोन के पास बैठा था तब नहीं आया। अब क्या बाथरूम भी ना जाऊँ। क्या चाहती हो तुम। तुम्हें क्या, बस देखती रहो सास-बहू के वाहियात सीरियल और गहने साड़ियों की नुमाइश।”

रामजी लाल बड़बड़ाते हुए टेलीफ़ोन की खीझ पत्नी पर उतार रहे थे।

“हो गया? तुम्हारा ग़ुबार निकल गया हो तो कुछ अर्ज़ करूँ?” अंजलि ने कहा, “जब घण्टी बजी तो सोचा कि तुम ही हमेशा की तरह फ़ोन उठा लोगे। अब मुझे क्या मालूम कि तुम बाथरूम गए हो। दूसरी बार घण्टी बजने पर किसी तरह अपने आप को समेटते हुए उठ ही रही थी कि तुम बाथरूम से चिल्ला पड़े। जैसे तैसे फ़ोन तक ही पहुँची थी कि मरा ये फ़ोन बंद हो गया।”

अंजलि अपनी भड़ास निकालते हुए बोली, “इस फ़ोन को ना जाने मुझसे ही क्यों दुश्मनी है। एक तो घुटनों के दर्द के मारे चला नहीं जाता और जब भी फ़ोन तक पहुँचों तो इसकी बोलती बंद हो जाती है। बिलकुल गुड्डू की तरह।”

अंजली की आँखें नम हो आयीं।

गुड्डू जब छोटा था तो एक दिन ना जाने क्यूँ गला फाड़-फाड़ रो रहा था। अंजलि ने आव न देखा ताव लगा दिए चार चांटे। गुड्डू सहम गया था। उसका रोना पहले हिचकी में बदला और फिर एकाएक चुप हो गया। इसके बाद तो गुड्डू कितना ही रोता हो पर अंजलि को देखते ही चुप हो जाता था। अब इस टेलीफ़ोन को ही देख लो, मुझे देखते ही चुप हो जाता है। गुड्डू अब तो अपनी मम्मी को माफ़ कर दो। अंजलि फूट-फूटकर रो पड़ी।

रामजी लाल अंजलि को सम्भालते हुए बोले, “उसके बाद तो तुम भी कितना रोयी थीं। गुड्डू को कितना प्यार किया था। उसे उसकी मनपसंद आइसक्रीम भी खिलाने ले गयी थीं। मत कोसो अपने आप को। अरे अब चुप भी हो जाओ।”

राम जी लाल अंजलि को सीने से लगाते हुए बोले- “अरे पगली ये टेलीफ़ोन ही तो हमारी लाइफ़ लाईन है।”

पिछले दो वीकेंड से गुड्डू का फ़ोन नहीं आया था। आज ज़रूर फ़ोन आने की उम्मीद थी। क्योंकि आज शनिवार था और इत्तिफ़ाक़ से आज ही रामजी लाल और अंजलि की शादी की चालीसवीं वर्षगाँठ भी थी। इसीलिए रामजी लाल और अंजलि दोनों फ़ोन के पास ही बैठे थे।

शाम के सात बज चुके थे। अंजलि बोली, “अब तो वहाँ अमेरिका में काफ़ी दिन चढ़ आया होगा। फ़ोन आता ही होगा। कहीं उस दिन की तरह फिर बाथरूम ना चले जाना।” कहते हुए अंजलि हंस पड़ी।

तभी फ़ोन की घण्टी बजी। रामजी लाल ने लपककर फ़ोन उठाया और जल्दी से बोले – “हेलो बेटा मैं बोल रहा हूँ। तुम कैसे हो।”

उधर से एक निर्लिप्त-सी आवाज़ सुनायी दी, “मैं बीएसएनएल से सुपरवाईज़र बोल रहा हूँ। अब आपका फ़ोन तो ठीक से काम कर रहा है।” उसने पूछा।

“जी बिलकुल ठीक काम कर रहा है, कम्प्लेंट लिखाने के तीन दिन बाद, दो दिन पहले ही ठीक हो चुका है।” धन्यवाद कहकर रामजी लाल ने जल्दी से फ़ोन काट दिया। अंजलि सब सुनकर हँस पड़ी।

पाँच मिनट बाद फिर एक फ़ोन आया। अंजलि बोली, “इस बार ज़रूर गुड्डू का ही होगा, अरे जल्दी से उठाइए।”

रामजी लाल ने फ़ोन उठाया। उनके हेलो बोलने से पहले ही उधर से रिकार्डेड आवाज़ सुनायी दी, “नमस्कार बीएसएनएल में आपका स्वागत है। अब आप अपने अपनों से बात कर सकते हैं केवल एक पैसे प्रति सेकेंड में। वो भी मनपसंद कॉलर ट्यून के साथ।”

इसके आगे कुछ सुनने से पहले ही रामजी लाल ने फ़ोन काट दिया। अंजलि फिर हँस पड़ी।

“हाँ हँसो, इस बार मैं फ़ोन उठाने वाला नहीं हूँ, समझी।” रामजी लाल खिसियाहट भरे स्वर में बोले।

काफ़ी देर ख़ामोशी छायी रही। तभी फ़ोन घिनघिना उठा। ट्रिनट्रिन… ट्रिन ट्रिन…।

“अरे अबकी बार तुम फ़ोन उठाओ।” रामजी लाल ने अंजलि से कहा।

अंजलि ने फ़ोन रिसीव किया। उधर से एक कड़क-सी आवाज़ में किसी ने कहा, “अबे इतनी देर से फ़ोन क्यूँ नहीं उठा रहा है।”

अंजलि ने माउथपीस पर हाथ रख कहा, “लो तुम्हीं बात कर लो।”

रामजी लाल ने पूछा, “अरे कौन है।”

“अब तुम्हीं पूछ लो ना!” अंजलि ने फ़ोन पकड़ाते हुए कहा।

रामजी लाल ने फ़ोन पर कहा, “कौन साहब बोल रहे हैं।”

“बोल रहा हूँ तुम्हारा बाप। अबे अब क्यों पहचानोगे। ऐश में कहीं ख़लल तो नहीं डाल दिया।” उधर से आवाज़ आयी।

“अबे सुरेश के बच्चे, बरसों बाद हमारी याद आयी है।” रामजी लाल ने अपने बचपन के दोस्त सुरेश को पहचानते हुए कहा।

“चलो ग़नीमत है पहचान तो लिया। तुम्हारी याददाश्त ठीक है। तुम्हारी दिमाग़ी हालत का टेस्ट भी हो गया”, सुरेश ने हँसते हुए कहा।

इसके पहले कि रामजी लाल बातों में मशग़ूल हो जाते, अंजलि ने उन्हें धीरे से याद दिलाया कि गुड्डू का अमेरिका से फ़ोन आने वाला है, बात ख़त्म करो ना। रामजी लाल ने सुरेश से कहा कि बाद में बात करते हैं और ये कहकर फ़ोन काट दिया।

एक घण्टा और बीत गया। परन्तु कोई फ़ोन नहीं आया। राम जी लाल बोले, “अब तो रात के नौ बजने को हैं, और कितना इंतज़ार करें।”

“तुम्हीं फ़ोन मिला लो”, अंजलि ने सुझाव दिया।

“तुम्हीं फ़ोन मिला लो” – रामजी लाल ने मुँह बनाकर दोहराया और अंजलि को याद दिलाया कि तुम्हें याद नहीं कि जब पिछली बार हमने फ़ोन मिलाया था, क्या कहा था बेटे ने – पापा क्यूँ बेकार में आप पैसे ख़र्च करते हो, जब भी मौक़ा मिलेगा तब मैं ही फ़ोन मिला लिया करूँगा।

“ठीक है, कॉल मत करो, मिस कॉल ही मार दो।” अंजलि बोली।

“तुम कहती हो तो मिसकॉल मार देता हूँ।” रामजी लाल ने नम्बर मिलाया और जैसे ही घण्टी बजी, फ़ोन काट दिया और उधर से फ़ोन आने का इंतजार करने लगे।

बहुत देर होने पर रामजी लाल ने फिर दो बार मिसकॉल की। इस बार उधर से कॉल आ गयी। फ़ोन की घण्टी बज उठी। ट्रिन ट्रिन। पहली घण्टी पूरी बजी भी ना थी कि रामजी लाल फ़ोन उठाते हुए बोले – “हेलो बेटा।”

“प्रणाम, बाबूजी मैं बोल रही हूँ”, उधर से बहू की आवाज़ आयी।

रामजी लाल ने स्पीकर ऑन कर दिया था जिससे अंजलि भी सुन ले और बात कर ले। रामजी लाल बोले, “ख़ुश रहो, कैसी हो बहू।”

“हम सब तो ठीक हैं पर आप क्यों कॉल पर कॉल किए जा रहे हैं, कोई इमरजेंसी हो गयी है क्या।”

“नहीं ऐसी कोई ख़ास बात नहीं है बहू, बस दो वीकेंड से बात नहीं हुई थी इसीलिए।” रामजी लाल सफ़ाई देते हुए बोले, “बेटा ज़रा गुड्डू से भी बात करा देना।”

“कल रात इनके बॉस की शादी की पच्चीसवीं वर्षगाँठ थी। पार्टी देर रात ख़त्म हुई इसीलिए अभी सो रहे हैं”, बहू ने जवाब दिया।

“अच्छा उसे हमारा आशीर्वाद कहना और… और…”

“और क्या?”, बहू बीच में ही बात काटते हुए बोली, “अभी पिछले हफ़्ते ही सौ डॉलर भेजे हैं मिल गए होंगे, अगर और ज़रूरत हो तो बता दीजिये।”

“हाँ, वह सौ डॉलर तो मिल गए हैं, बस्स यही कि रूपये-पैसे की ज़रूरत नहीं है। गुड्डू से कह देना बेकार चिंता न करे। ठीक है अब फ़ोन रखता हूँ। तुम लोग अपना ध्यान रखना।” कहकर रामजी लाल ने काँपते हाथों से फ़ोन काट दिया।

अंजलि इस बार रो रही थी या हँस रही थी, कैसे पता चलता। परन्तु मुँह में कपड़ा ठूँसे, आँखों में बहती धार, उसकी मर्म कथा को बयाँ कर रही थी। रामजी लाल अंजलि को अपने हृदय से लगाते हुए बोले, “तुमने स्पीकर फ़ोन पर तो सब कुछ सुन ही लिया। आज अपनी शादी की चालीसवीं वर्षगाँठ है, बेटे बहू को याद नहीं रहा होगा तो मैं ही फ़ोन पर उन्हें याद दिलाकर दोनों को आशीर्वाद देना चाह रहा था। पगली आज रोने का दिन नहीं, पार्टी करने का दिन है।”

अंजलि बोली, “तुम भी न बस, तुम कभी नहीं बदलोगे। सबकी अपनी-अपनी ज़िन्दगी है। शायद हमीं उनकी ज़िन्दगी में बेवजह मिसकॉल मारते रहते हैं।”

तभी घण्टी बजी, लेकिन फ़ोन की नहीं, डोरबेल की थी। रामजी लाल ने दरवाज़ा खोला। सामने उनके बचपन का दोस्त सुरेश खड़ा था। बड़ा-सा केक हाथ में लिए। सुरेश अन्दर आते ही ज़ोर से चिल्लाया- “भाभी शादी की बर्षगाँठ मुबारक हो। मेनी हैप्पी रिटर्न्स ऑफ़ द डे।”

रामजी लाल और अंजलि ने एक दूसरे को देखा, दोनों की आखें नम हो आयीं और फिर तीनों ज़ोर से हँस पड़े।

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