लिखो, मैं मियाँ हूँ!

‘मियाँ पोएट्री’ असम में मुसलमान कवियों के द्वारा ‘मिया’ बोली में लिखी गयी कविताएँ हैं, जो उनके साथ होते आए सामाजिक भेदभाव को दर्ज करती हैं। प्रस्तुत कविता इसी मिज़ाज की एक कविता है, जिसे हफ़ीज़ अहमद ने लिखा है। हिन्दी अनुवाद अनुराधा अनन्या और अंजली नोरन्हा ने किया है, और सलीम एम. हुसैन के अंग्रेज़ी अनुवाद पर आधारित है।

लिखो

लिखो
मैं मियाँ हूँ
NRC में मेरा नम्बर 200543 है
मेरे दो बच्चे हैं
और एक आने वाला है
अगली गर्मियों में
क्या तुम उससे उतनी ही नफ़रत करोगे
जितनी तुम मुझसे करते हो

लिखो
मैं मियाँ हूँ
मैंने बंजर, दलदली
ज़मीन को
धान के हरे-भरे लहलहाते खेतों में तब्दील किया
ताकि तुम्हारा पेट भर सके

मैं ईंटें ढोता हूँ
तुम्हारी इमारतें बनाने के लिए,
तुम्हारी कार चलाता हूँ
तुम्हारे आराम के लिए,
मैं तुम्हारी गन्दी नालियाँ साफ़ करता हूँ
ताकि तुम रह सको तन्दरुस्त,
मैंने हमेशा तुम्हारी सेवा की है
लेकिन फिर भी तुम रहे असंतुष्ट

लिखो
कि मैं मियाँ हूँ
एक लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष, गणतंत्र में
एक नागरिक
बिना किसी अधिकार के

मेरी माँ को डी-वोटर क़रार दिया गया
हालाँकि उसके माँ-बाप तो हिन्दुस्तानी ही हैं

अगर तुम चाहो तो मुझे जान से मार सकते हो
मुझे मेरे गाँव से खदेड़ सकते हो
मुझसे मेरे हरे-भरे खेत छीन सकते हो
तुम्हारा रोलर
मेरे बदन को कुचल सकता है,
बिना किसी सज़ा के
तुम्हारी बन्दूक की गोलियाँ मेरी छाती छलनी कर सकती हैं

लिखो
मैं मियाँ हूँ
ब्रह्मपुत्र के किनारे रहते हुए
सहते हुए तुम्हारे जुल्म
मेरा बदन काला पड़ गया है
मेरी आँखें आग से लाल हैं

ख़बरदार
अब मेरे भीतर सिर्फ़ ग़ुस्सा ही भरा है
दूर रहो
या
फिर
भस्म हो जाओ!

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