वरिष्ठ लेखक मोहनदास नैमिशराय जी के साथ राजश्री सैकिया की बातचीत

जिस दलित-बहुजन विचारधारा के बूते आज भारत का बौद्धिक समुदाय प्रतिगामी शक्तियों से लड़ने की कोशिश कर रहा है, उसके बीज दलित साहित्य में रहे हैं। दलित साहित्य के जन्म, विकास और इसकी मौजूदा स्थिति को समझने के लिए युवा आलोचक राजश्री सैकिया ने हमारे समय में मौजूद हिन्दी के वरिष्ठ लेखक मोहनदास नैमिश्यराय से बातचीत की। 73 वर्षीय नैमिश्यराय मराठी और हिन्दी में दलित साहित्य के जन्म और विकास की प्रक्रिया के न सिर्फ़ साक्षी और सहभागी, बल्कि इसके स्वरूप के निर्माताओं में से एक रहे हैं। प्रस्तुत हैं बातचीत का चुनिंदा अंश— 

राजश्री सैकिया: दलित साहित्य की अवधारणा के बारे में समझना चाहूँगी। आप दलित साहित्य किसे कहेंगे? और यह भी कि आपके अनुसार दलित शब्द की परिभाषा क्या है? दलित हम किसे कहेंगे?

मोहनदास नैमिशराय: देखिए कि ऐसा है, दलित शब्द की परिभाषा में मैं नहीं जाता। दलित का मतलब है जो व्यक्ति हाशिए पर है या हाशिए पर रहा है। और, दलित साहित्य वह साहित्य है, जिसमें चेतना है, जिससे आदमी सजग हो रहा है, सावधान हो रहा है, अपने अधिकारों के बारे में समझ रहा है, जाग रहा है।

राजश्री सैकिया: दलित साहित्य की शुरुआत आप कब से मानते हैं?

मोहनदास नैमिशराय: हमारा मानना है कि जब से तथागत बुद्ध ने सामाजिक न्याय के लिए कार्य की शुरुआत की, लोगों को जगाया, ब्राह्मणवाद पर कुठाराघात किया, समाज में धार्मिक स्तर पर, सामाजिक स्तर पर जो जातिभेद था, उस पर वार किया; तब से दलित साहित्य का एक अंकुर पैदा हुआ और वह धीरे-धीरे पौधा बना और उसके बाद पेड़ बनता चला गया। हम तथागत बुद्ध के समय से ही दलित साहित्य की शुरुआत मानते हैं।

राजश्री सैकिया: आपके अनुसार दलित के अंतर्गत कौन से सामाजिक समुदाय शामिल हैं? यानी क्या सिर्फ़ अनुसूचित जाति में शामिल लोग ही दलित हैं, या अन्य पिछड़े वर्गों में भी जो अति पिछड़े हैं उन्हें भी दलित की परिभाषा के अंतर्गत रखेंगे?

मोहनदास नैमिशराय: दलित साहित्यकारों के लिए कोई जातिभेद नहीं है। मेरी कहानी ‘महाशूद्र’ महा-ब्राह्मणों पर है। वे महा-ब्राह्मण (मृत्युोपरांत मोक्ष प्राप्ति हेतु  क्रिया-कर्म करवाने वाली एक विशेष ब्राह्मण जाति, जो आर्थिक रूप से दरिद्र हैं तथा जिन्हें अन्य ब्राह्मण अपने समकक्ष नहीं मानते) भी दलित में शामिल हैं। तमाम अन्य पिछड़ी जाति (ओबीसी) के लोग इस अवधारणा में शामिल हैं। वे सभी दलित हैं, जिनके साथ जातिभेद होता था। अन्य पिछड़ा समाज की भी स्थिति ऐसी ही रही है, उनके साथ भी जातिभेद होता था। उनके साथ समाज में ग़लत व्यवहार भी होता था। जिसके साथ जातिभेद या भेदभाव होता है, जिसको मनुष्य नहीं समझा जाता, वो सभी दलित की अवधारणा के भीतर आते हैं और वे अपने बारे में जो भी लिखते हैं उसे हम दलित साहित्य कहते हैं।

राजश्री सैकिया: क्या आप मानते हैं दलित साहित्य सिर्फ़ दलित ही लिख सकते हैं?

मोहनदास नैमिशराय: नहीं, पूरी दुनिया में दलित साहित्य कोई भी लिख सकता है। लेकिन अब सुन लीजिए जो मैं कहने जा रहा हूँ। इससे सम्बन्धित एक बड़ी राजनीति का खेल सवर्ण जाति के लोगों ने किया। उन्होंने यह खेल इसीलिए शुरू किया क्योंकि जब दलित साहित्य आया, तब ये समाज में, गाँवों में, शहरों में लोकप्रिय होता चला गया। लोग इसे जानने लगे, पढ़ने लगे। महिलाएँ दलित साहित्य पढ़ने लगीं और अपने अधिकारों की बात समझने लगीं। इसने एक बड़े तूफ़ान की तरह समाज के अंदर प्रवेश किया। इस कारण साहित्य पर, यूनिवर्सिटियों पर, धन पर जिन सवर्ण साहित्यकारों की इजारेदारी थी, ठेकेदारी थी, उनके सिंहासन डोलने लगे। तब उन्होंने कहा कि हम भी दलित साहित्य लिख सकते हैं। अरे, तो हम क्या आपको मना कर रहे हैं आपको दलित साहित्य लिखने से? लिखिए न!

लेकिन आपने जो सवाल किया तो हमारी तरफ़ से सभी का दलित साहित्य में स्वागत है। सवर्ण साहित्यकार भी दलित साहित्य लिख सकते हैं, लेकिन मंदिरों में पूजा करने वाले साहित्यकार, चेतना से शून्य साहित्य, देवी-देवताओं का महिमामण्डन करने वाला साहित्य, सरस्वती की पूजा करने वाला साहित्य हमको, क़तई स्वीकार नहीं हैं।

हाँ, स्वदेश दीपक जी कहानी ‘कोर्ट मार्शल’ को मैं दलित साहित्य में बड़े सम्मान के साथ दलित साहित्य की श्रेणी में शामिल करता हूँ। क्या कमाल की रचना है कोर्ट मार्शल! मैं तो बाग़-बाग़ हो गया। हो सकता है कि किसी अन्य ग़ैर-दलित की भी कोई रचना ऐसी हो, जो अब तक मेरे पढ़ने में नहीं आयी हो। लेकिन प्रेमचंद से लेकर कमलेश्वर तक, डॉ. महीप सिंह से लेकर राजेंद्र यादव तक की रचनाएँ उस तरह की नहीं हैं, जिससे चेतना का वैसा सूरज उगता है। या आप बताएँ मुझे कि किस सवर्ण साहित्यकार ने ऐसी रचना लिखी है जिसको आप दलित साहित्यकारों के समानांतर रख सकें?

राजश्री सैकिया: प्रेमचंद के साहित्य को आप दलित साहित्य मानेंगे?

मोहनदास नैमिशराय: प्रेमचंद के साहित्य में कुछ रचनाएँ हैं, कुछ कहानियाँ है, जिनमें उस प्रकार की चेतना का आभास होता है। मैंने कई बार इसके बारे में लिखा भी है। हम प्रेमचंद का सम्मान करते हैं लेकिन प्रेमचंद के सारे साहित्य को हम दलित साहित्य नहीं मानते हैं।

राजश्री सैकिया: फणीश्वरनाथ रेणु जैसे रचनाकार को, जो जाति के सवाल को बहुत गहराई से देखते हैं, उनको आप किस कोटि में रखना चाहेंगे?

मोहनदास नैमिशराय: ज़बरदस्त साहित्यकार हैं रेणु। उन्हें मैं सलाम करता हूँ। मेरी नयी किताब ‘हिन्दी दलित साहित्य के इतिहास’ में उन पर एक लम्बा लेख आ रहा है। उन्होंने दलित विषयों पर बड़ी गहराई में जाकर लिखा। उनकी भाषा देखें, शैली देखें, आँचलिक शब्द देखें। हालाँकि गाँव की जो शैली होती है, उस कारण वह कहीं-कहीं पूजा-अर्चना की ओर भी भटकते हैं। लेकिन उनके साहित्य से जो स्वर निकलता है,  उसमें कहीं न कहीं एक प्रखर चेतना का स्वर है, इसलिए रेणु जी का हम सम्मान करते हैं।

राजश्री सैकिया: आप हिन्दी के श्रेष्ठ लेखकों में शुमार हैं, लेकिन आपकी नज़र में किन दलित लेखकों का लेखन महत्त्वपूर्ण है? किन दलित कृतियों ने आप को प्रभावित किया है?

मोहनदास नैमिशराय: मेरे समानांतर ओमप्रकाश वाल्मीकि लिख रहे थे। उन्होंने ज़बरदस्त कहानियाँ लिखी हैं। ‘कहाँ जाए सतीश’ और ‘माँ’ नाम से या ‘अम्मा’ नाम से भी उनकी बहुत अच्छी कहानी है। मेरे समय में बिहार से एक लेखक बुद्धशरण हंस लिख रहे थे, लेकिन वे थोड़ा-सा परम्परा से जुड़े हुए थे। उनकी भी एक-दो कहानियाँ मुझे अच्छी लगीं। लेकिन नम्बर एक में ओमप्रकाश वाल्मीकि। नम्बर दो पर बुद्धशरण हंस। बटरोही जी को मैंने पढ़ा है, बटरोही जी की पत्नी कावेरी भी बहुत सशक्त कहानीकार रही हैं। लेकिन ऐसे लेखक कम हैं जो ब्राह्मणवाद को बिल्कुल विषवृक्ष समझकर और क़लम को कुल्हाड़ी बनाकर बात कर रहे हैं। उत्तर भारत के दलित समाज में तो ज़्यादा से ज़्यादा ऐसे आठ-दस कहानीकार हैं, इससे ज़्यादा नहीं।

जयप्रकाश कर्दम जी भी कहानी लिखते हैं लेकिन उनकी कहानियाँ मानदंड नहीं हैं। उनमें चेतना है लेकिन उसकी आँच बहुत धीमी है। वह उस तरह से छाप नहीं छोड़ती हैं। दरअसल जयप्रकाश कर्दम जी का जो लेखन है, वह लेखन का प्रयास है। डॉ. श्यौराज सिंह बेचैन का भी लेखन, लिखने का प्रयास है। प्रयास शब्द मैं इस्तेमाल कर रहा हूँ। हो सकता है उनको बुरा लग जाए लेकिन लिखने का उनका प्रयास है इसलिए मैं उनको धन्यवाद भी देता हूँ। लोग कहानियाँ लिख रहे हैं लेकिन कहानी से जो एक जैसे ज्वाला भड़कनी चाहिए है और जैसा उसके भीतर से चेतना का सूरज उगना चाहिए है, वैसा लिखने वाले कहानीकार हिन्दी जगत में बहुत कम हैं।

राजश्री सैकिया: मधुकर सिंह जी अन्य पिछड़ा वर्ग की एक किसान जाति में पैदा हुए। लेकिन उनकी कई किताबों में उनका जो परिचय है, उसमें उन्हें दलित साहित्यकार कहा गया है। ऐसा क्यों हुआ होगा?

मोहनदास नैमिशराय: मधुकर सिंह ने चेतना से लैस लेखन किया है। मधुकर जी को अगर किसी ने दलित साहित्यकार माना है तो मुझे कोई एतराज़ नहीं है। मैं इसका स्वागत करता हूँ। उन्होंने बहुत सशक्त लेखन किया है।

लेकिन आपके इस सवाल से मुझे बिहार के एक दूसरे कहानीकार का नाम याद आ गया—रामधारी सिंह दिवाकर जी। दिवाकर जी को अभी दिल्ली में इफ़को पुरस्कार मिला है। दिवाकर जी की कहानी में ब्राह्मण समाज के आदमी और दलित समाज के बीच जो बातचीत चलती है वो बहुत शिष्टतापूर्वक चलती है। उनकी कहानी को हम सुधारात्मक कहानी कह सकते हैं। उनमें चेतना बहुत कम है, सुधार की भावुकता बहुत ज़्यादा है।

राजश्री सैकिया: आप कँवल भारती के साहित्य के योगदान को किस तरह से देखते हैं? उनकी किन कृतियों या विचारों ने आपको सबसे अधिक प्रभावित किया है? क्या उनके लेखन में आप कोई कमज़ोरी भी देखते हैं?

मोहनदास नैमिशराय: ओमप्रकाश वाल्मीकि जी ने एक बार सूरजपाल चौहान के घर पर एक बात कही थी। उन्होंने कहा था उत्तर भारत में केवल ढाई लेखक हैं। सूरजपाल चौहान ने पूछा कि वे ढाई लेखक कौन हैं? तब वाल्मीकि जी ने कहा कि एक मैं और एक नैमिशराय और आधा तुम।

कँवल भारती एक ऐसे लेखक, पत्रकार, समीक्षक, आलोचक हैं जो मेरे समानांतर लिखते रहे हैं। मैं वाल्मीकि जी की तरह यह तो नहीं कहूँगा कि सिर्फ़ दो ही लेखक हैं नैमिशराय और कँवल भारती। ऐसा मैं नहीं कहूँगा। बहुत सारे अन्य भी लोग लिखते हैं। लेकिन सच तो यह है कि नियमित लिखने वाले कँवल भारती जी ही हैं। कबीर पर उन्होंने बहुत ज़बरदस्त लिखा है, रविदास पर भी उन्होंने बहुत अच्छा लिखा। और जो बहस होती है वाल्मीकि पर कि कौन थे? ब्राह्मण थे या दलित—इस विषय पर भी उन्होंने बहुत शिद्दत के साथ काम किया है।

आलोचक के रूप में जैसे डॉ. धर्मवीर, डॉ. एन. सिंह और तेज सिंह जी भी रहे हैं लेकिन कँवल भारती जी इन सबसे बहुत आगे निकल गए हैं। इन सबमें सशक्त रूप से लिखने वाले कँवल भारती जी ही हैं। उनका जो काम है वह सर पर चढ़कर बोलता है और मुझे यह कहने में कोई एतराज़ नहीं है। आलोचना लिखने वाले जितने लोग हैं, मैं सिर्फ़ उत्तरी भारत की बात नहीं कह रहा, पूरे भारत में कँवल भारती जैसा आलोचक दलित समाज में कोई नहीं है।

राजश्री सैकिया: आपने कई विधाओं में लेखन किया है, लेखन के लिए आपकी सबसे प्रिय विधा कौन सी है?

मोहनदास नैमिशराय: मैंने बहुत कम उम्र में यानी कि 12-13 साल में ही लिखना आरम्भ किया। सबसे पहले मैंने उपन्यास लिखा। इसका एक कारण यह था कि हमारे मेरठ में हर तीसरी गली में प्रेस थी। मेरठ में आसपास बहुत सारे साहित्यकार हुए हैं। मेरे मन में लगातार यह धारणा बनी रहती थी कि मुझे भी लिखना चाहिए। लेकिन आपका जो सवाल है, उसका उत्तर यह है कि मेरी प्रिय विधा कहानी है। कहानियाँ भी मैं बहुत पहले से लिखता रहा हूँ।

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Rajshree Saikia(राजश्री सैकिया असम विश्वविद्यालय के दीफू परिसर से ‘दलित साहित्य के विकास में कँवल भारती की आलोचना का योगदान’ विषय पर शोध कर रही हैं। उनसे [email protected] पर सम्पर्क किया जा सकता है!)

 

दलित पैंथर के संस्थापक ज. वि. पवार से राजश्री सैकिया की बातचीत यहाँ पढ़ें

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