अंतिम कविता
मृत्यु पर नहीं लिखूँगा
लिखूँगा जीवन पर

‘अंधेरा है’ को कहूँगा ‘प्रकाश की अनुपस्थिति-भर’
धोखे के क्षणों में याद करूँगा बारिश, हवा, सूरज
मेरे अंदर जन्मती घृणा को
बारिश बहाकर ले जाएगी
हवा उड़ाकर ले जाएगी
बचा हुआ कुछ
सूरज की तेज़ में तिरोहित हो जाएगा

‘रुकने’ को थोड़ी देर का विश्राम कहूँगा
मृत्यु को नींद
किसी के ‘मुश्किल है’ के कहने पर
मुस्कुराऊँगा
कहूँगा— ‘आओ साथ कोशिश करें’

भूलूँगा नहीं किसी को
जब वो लौटे तो गले लगा सकूँ, इतनी-भर उसकी पहचान बचाकर रखूँगा

जीवन में जीवन ढूँढूँगा
लिखूँगा प्रेम कविताएँ,
जिसने जितना-भर दिया जो कुछ

कविताओं में दर्ज करूँगा
इसी तरह हर दिन, एक कवि का जीवन जीऊँगा।

गौरव गुप्ता की कविता 'प्रेम में'

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