घर से लौटते वक़्त
मुड़-मुड़कर देखता हूँ,
दो-तीन जोड़ी आँखें
तब तक निहारती रहती हैं
जब तक उनकी पहुँच से
ओझल नहीं हो जाता,
लेकिन मैं नहीं देख पाता
एक बार भी
उन चेहरों को
आँखों में ऑंखें डालकर!
चुपचाप सधे हुए क़दमों से
आगे बढ़ जाता हूँ।

एक बार कोशिश की थी
देखने की,
लेकिन समझ नहीं पाया था
कि इतने सवाल, इतने जवाब और इतनी भावनाएँ
एक साथ समेटे उन चेहरों से क्या कहूँ
क्या सुनूँ
क्या समझूँ…