जब लौट जाते हो
तो आख़िर में थोड़ा
बच जाते हो तुम मुझमें।
मेरी आँखों की चमक
और नरम हथेलियों के
गुलाबीपन में
या निहारती हुई
अपनी आँखों में
छोड़ जाते हो मुझमें
बहुत कुछ-
जो एकटक तकती रहती हैं
मेरे होठों के नीचे के तिल को।
कभी श्यामल, कभी श्वेत,
तो कभी लाल रंग तुम्हारा,
रह-रह कर रंग देता है
मेरी रूह को।
आँखें मूँदकर भी
तुम्हारी छुअन ही टटोलती है
मेरे अंतस को,
जाते-जाते आख़िर में तुम
थोड़ा बच जाते हो मुझमें।

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