‘Mujhe Jinse Prem Hai’, a poem by Aditya Krishna

तुम्हारे देह की गन्ध-
जो मिट्टी और पसीने के मिलने जैसी है,
वह बनती है
जब तुम कड़ी धूप में-
खुरपी लेकर जाती हो,
खेत से आलू निकालने,
और आती हो मिट्टी और पसीने में सनी।

तुम्हारा यह छाँव-सा साँवला शरीर,
शायद पूर्णतः तुम्हारा ही है,
पर जो तुम्हारे चेहरे पर आयी यह लालिमा है,
वह बनती है
जब तुम अपना चूल्हा गोबर से लीपने के बाद,
उसमें लकड़ी देकर,
फूँक-फूँक कर सुलगाती हो,
और चढ़ाती हो पतीले में पानी,
बनाने के लिए मोटे- ‘उसना’ चावल का भात।

तुम्हारी चाँदी की वो चूड़ियाँ,
जो तुम्हारे हाथ से ज़्यादा
महाजन की तिजोरी में रहती हैं-
और तुम बार-बार छुड़वाती हो,
फिर गिरवी रखने के लिए।
वो जब तुम्हारी साँवली कलाई पर चमकती हैं न,
तो मुझे बहुत अच्छी लगती हैं।

तुम्हारी हथेली पर यह निशान,
पड़ गए होंगे जब तुम
अपनी बकरी का दूध निकालती हो।
तुम बहुत सुंदर लगती हो-
जब उस बकरी के छोटे-छोटे बच्चों को
अपनी हथेलियों में उठाकर प्यार से चूमती हो।

तुम्हें शायद लगता हो-
कि मुझे तुमसे प्रेम-जैसा कुछ है,
और यह असत्य भी नहीं।
हाँ, पर यह भी याद रहे-
कि मुझे तुम्हारी जिन चीजों से प्रेम है,
वो बस तुम-भर ही तो नहीं हो।

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