मुझे कौवे बहुत पसंद हैं

एक क़दम पास आते ही उड़ जाते हैं ‘कबूतर’
यहाँ तक कि कुत्ते भी मुँह बिचकाकर चले जाते हैं थोड़ी दूर पर
लेकिन थोड़ा ठुमक कर
केवल ज़रा बग़ल होते हैं कौवे

कौवे ‘रेसिज़म’ का शिकार हुए हैं
और ये बात वे जानते भी हैं
लेकिन फिर भी
वे चलते हैं
सिद्धांतों के रास्ते पर

वे काट लेते है
किसी के झूठ बोलने पर

‘झूठ बोलने पर काट लेना…
इस मिज़ाज का सनकीपन
केवल उसूल वालों के पास होता है’

इतने उसूल वाले
तो राष्ट्रीय पक्षी कहे जाने वाले मोर भी नहीं होते
उनमें राष्ट्र के नाम का अभिमान जो होता है
वे राष्ट्र के नाम पे
कंकड़-कंकड़ जोड़
बना सकते हैं किसी बाँसुरी वाले का घर
मगर कौवे
कंकड़-कंकड़ जोड़ बुझा सकते हैं
पूरे राष्ट्र की प्यास
कौवों को है राष्ट्र से मुहब्बत

तेज़ बारिश में बिजली के तार पे बैठा एक अकेला कौवा
हमारे समाज की संस्कृति पे एक बड़ा व्यंग करता
अक्सर दिख जाता है…

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I write, I act, I sing

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