मुझे स्वयं को भरना नहीं आता

‘Mujhe Swayam Ko Bharna Nahi Aata’, a poem by Chandra Phulaar

मैंने जहाँ भी ख़ालीपन देखा
उसे भरना चाहा
मैंने आकाश का सूनापन देख-
अपने आँचल का सितारा नोचा
और सजा दी नीले आसमान पर
चन्द्रमा की बिंदी।
उसने मेरी उधारी अब तक नहीं चुकायी…!

मैंने तुम्हें रिक्त देखा
निचोड़ दिया अपना हृदय
कसकर… दोनों हाथों से
और कर दिया तुम्हें
प्रेम रस से सराबोर
तुम बस बिस्तर पर ही
लिपटे मुझसे…!

मैंने तुम्हारी थाली भरी
कच्चे अनाज को
पका कर,
और खुद भी पकी
रसोई में धीमी आँच पर,
बहुत देर तक।
मैं राख हुई-
कोई न आया देखने!

मैंने बच्चों के बस्ते में
बटोर-बटोरकर
यहाँ-वहाँ फैली किताबें भरी
और कहलायी बे-सहूर… अनपढ़।
भरा उनके डब्बे में
स्वाद पराँठा… मीठा भात
वो बाहर के खाने पर
चाटते रहे हाथ!

मैंने सासू के घुटनों में भरा
दर्द भगाने वाला तेल
और खायी लात,
मैंने छुटपन से
पीहर भरा
पर मेरे लिए
नहीं ख़ाली वहाँ
कोई कोना…!

मैं नदी हूँ
मेरा जल मेरी प्यास नहीं बुझाता
मैं वृक्ष हूँ
नहीं जानती स्वयं को सींचना
मैं औरत हूँ
मुझे स्वयं से प्रेम करना
नहीं आता।
मैंने सम्पूर्ण सृष्टि को भरा
मुझे स्वयं को भरना नहीं आता…!

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