(1)
भोग की चाह में भगवान को बदनाम न कर,
अपने इंसान को शैतान का गुलाम न कर
बुद्ध के देश की मिट्टी से देह है बनी,
रूप की रात में मुसकान को नीलम न कर।

(2)
दीन के रक्त से जिनके चिराग जलते हैं,
और फिर चीटियाँ चुगाने को निकलते हैं
उनके धर्मात्मापने पर रहम आता है,
स्याहियां पीते और सोखता निगलते हैं।

(3)
ठसक की चालें राह को नहीं जगा सकतीं,
धरा के घाव में मरहम नहीं लगा सकतीं
तुम्हारी ठोकरें यह धूल उड़ा सकती हैं,
किसी के खेत में फसलें नहीं उगा सकतीं।

(4)
सर्प सी फुफकार लेकर आप आये हैं,
दीप के निर्वाण का संदेश लाये हैं
पर बुझाने से प्रथम यह तो कहो अब तक,
आपने कितने बुझे दीपक जलाये हैं।

(5)
समय-समय को देखकर राग गाये जाते हैं,
करुण के बाद तरुण स्वर बजाये जाते हैं
पाखरे जाते कभी आसुओं से माँ के चरण,
कभी लहू की नदी में धुलाये जाते हैं।

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