हाँ, सितम्बर का महीना हर साल हमें मुक्तिबोध की याद दिलाएगा—क्योंकि गत वर्ष इसी महीने उनका देहांत हुआ। जून के महीने में जब वे उपचार के लिए दिल्ली लाए गए थे, तब उनके मित्रों और शुभचिंतकों ने जी-जान से चेष्टा की थी कि वे चंगे हो जाएँ। और जब वे सारी आशाओं पर पानी फेरकर चल दिए तो परे साहित्य-समाज में शोक छा गया था। पर शोक के नीचे त्रास का भी एक काँटा था जिसको मैंने तभी लिखे इस वक्तव्य में व्यक्त किया था जो अभी तक अप्रकाशित ही रहा—

कल तक मुक्तिबोध भविष्य थे, आज इतिहास बन गए। और जब भविष्य अधूरे रूप में ही इतिहास बन जाता है तो एक टीस छोड़ जाता है। आज हमारे मन में वही टीस है। ऐसा नहीं है कि 11 सितम्बर की रात को नौ बजकर दस मिनट पर जब उन्होंने आख़िरी साँस ली तो कोई अनभ्र वज्रपात हुआ हो। महीनों पहले से मृत्यु के ये बादल मुक्तिबोध के चारों ओर मंडरा रहे थे और उनके अनेकानेक हितैषी और मित्र इन बादलों का गहरा रंग देखकर काँप उठते और अपने नन्हे-नन्हे हाथों से मुक्तिबोध को ढकने का प्रयत्न करते। प्रयत्न करते थे पर यह भी जानते थे कि यह प्रयत्न व्यर्थ रहेगा। मुक्तिबोध जहाँ पहुँच चुके हैं, वहाँ से उनको वापस लाना चमत्कार ही कहलाएगा, और चमत्कार आज के युग में कहाँ होते हैं? इललिए मुक्तिबोध का जाना हमें कितना ही दुख और विकलता पहुँचाए, उसकी पूर्व-सूचना हमको थी। पर मन में जो टीस हुई, वह असल में इस बात को लेकर कि मुक्तिबोध क्यों इस स्थिति तक पहुँचे कि 46 साल पूरे करते-न-करते वे इस संसार से विदा हो जाएँ और अपने मित्रों को ऐसी स्थिति में छोड़ जाएँ कि रोते भी न बनता हो।

क्या मुक्तिबोध में कोई मर्मांतक कमी या कमज़ोरी थी? क्या उनकी प्रतिभा और लगन ओछी थी? क्या उन्होंने अपनी ज़िन्दगी के साथ कोई लापरवाही बरती थी? क्या उन्होंने अपने कर्तव्यों से मुँह मोड़ा था? क्या वे हार मान बैठे थे? इन, और ऐसे ही अन्य अनेक प्रश्नों का एकमात्र उत्तर है : नहीं। तो फिर क्यों मुक्तिबोध का अंत, और अंत ही नहीं उनका समग्र जीवन, अपरितृप्त और अभागा रहा? इस प्रश्न का एकमात्र उत्तर यही है कि वे सच्चे अर्थों में लेखक थे, हिंदी के लेखक थे।

क्योंकि आज के समाज में लेखक होने से बड़ी विडम्बना और कोई नहीं है। उन लेखकों की बात और है जो शौक़िया लिखते हैं, जो लेखन को धर्म नहीं, आत्माभिव्यक्ति भी नहीं, विलास और क्षणिक यश की सीढ़ी बनाते हैं, या फिर जो लेखन को धंधा बनाये बैठे है। मैं तो उन लेखकों की बात कर रहा हूँ जो कृतिकार हैं, लेखन जिनकी आत्माभिव्यक्ति है; लेखन जिनके जीवन का एकांत कर्म और लक्ष्य है। ऐसे लेखकों की स्थिति आज के समाज में भयावह है। भारत के स्वतंत्र होने के बावजूद, भारत के जनतंत्र होने के बावजूद, भारत में शिक्षा का निरंतर प्रसार होने के बावजूद, भारत का लेखक और विशेष रूप से हिंदी का लेखक उपेक्षणीय व्यक्ति बना हुआ है। सिनेमा के लिए गीत लिखने पर चाहे आपको सुविधा और सम्पन्नता मिल जाए, टेक्स्ट बुकों के नाम से चलनेवाले भानमती के पिटारे जोड़ने पर चाहे आप मालामाल हो जाएँ, जनसाधारण की सुरुचि को विकृत करनेवाली गंदी और अश्लील पुस्तकों का ढेर लगाकर चाहे आप चार पैसे कमा लें, पर यदि आप लेखक बनना चाहते हैं तो हमारा समाज आपका जीवित रहना भी मुश्किल कर देगा। मुक्तिबोध यह न जानते रहे हों, ऐसा नहीं है। उन्होंने जान-बूझकर ही यह पथ अपनाया था। कोई भय या प्रलोभन उन्हें इस पथ से विचलित न कर सका और उन्होंने अपने निर्णय की क़ीमत अपने प्राण देकर चुकायी। और इस प्रकार उन्होंने प्रेमचंद, निराला, राहुल और रांगेय राघव की परम्परा में अपना नाम भी जोड़ दिया।

और मेरे मन में आज मुक्तिबोध के जाने पर यही उद्वेलन सबसे प्रमुख है। निस्संदेह मुक्तिबोध के बीमार पड़ने पर मध्यप्रदेश की सरकार ने उनके उपचार की व्यवस्था की। बाद में उनका रोग असाध्य हो जाने पर भारत सरकार के प्रधानमंत्री ने लेखकों के प्रतिवेदन पर तुरंत उन्हें दिल्ली बुलाया और अच्छी-से-अच्छी व्यवस्था में उनका इलाज करवाया। निस्संदेह पाँच-छः महीनों की उनकी बीमारी में उनके अनेक मित्रों ने दिन-रात चिंता और यत्न में काटे हैं, जिससे जो भी बन पड़ा किया है, बिना बताए भी किया है और ढिंढोरा पीटकर भी किया है, और निस्संदेह मुक्तिबोध के शोक में आज दैनिक पत्र बड़े-बड़े लेख निकाल रहे हैं, पत्रिकाएँ विशेषांक निकालेंगी, देश-भर में शोक-सभाएँ होंगीं, उनके स्मृति-ग्रंथ भी छापे जाएँगे और अचरज नहीं कि साहित्य में उनके योग का भी मूल्याँकन होने लग जाए। पर इन कामों से यह तथ्य मिटाया या बदला नहीं जा सकता कि मुक्तिबोध असमय ही चले गए हैं और ये काम यदि समय पर होते तो शायद वे अभी न जाते। मैं जानना चाहता हूँ कि हिंदी के अलावा संसार की किस भाषा में यह सम्भव है कि मुक्तिबोध के स्तर का कवि अप्रकाशित ही मर जाए। हम सब जानते हैं कि आज के पहले उनका एक भी काव्य-संग्रह प्रकाशित नहीं हुआ।

और मैं अपने इन शब्दों से अपने समानधर्मा चिंतकों, विचारकों और लेखकों से यही निवेदन करना चाहता हूँ कि वे सब मिलकर इस बात पर विचार करें कि क्या हमारे समाज में ही कोई ऐसा दोष नहीं है जो मुक्तिबोध जैसे प्रतिभासम्पन्न लेखक को भी लेखन-कर्म में अनवरत जुटे रहने की सुविधा नहीं दे पाता? क्या किसी कृतिकार के लिए यह ज़रूरी है, या क्या ज़रूरी होना चाहिए कि वह ज़िंदा रहने के लिए अपनी क़लम को विश्राम दे या उसका दुरुपयोग करे? और मुक्तिबोध ने ऐसा नहीं करना चाहा, क्या इसी कारण उनका असमय में अंत नहीं हुआ? जनतंत्र में यह सहज सम्भव होना चाहिए कि कलाधर्मी लेखक, जिसकी निष्ठा एकमात्र लेखन पर हो, आत्माभिव्यक्ति पर हो, औसतन सुविधापूर्वक जीवन-निर्वाह कर सके। इसके लिए यह ज़रूरी नहीं होना चाहिए कि वह शासन-सत्ता की चाटुकारिता करे, व्यावसायिक संस्थाओं या प्रतिष्ठानों के आगे गिड़गिड़ाए अथवा घटिया बनने को विवश हो।

इस त्रास से मैं उबर नहीं पाया हूँ, इसलिए कुछ दिन पहले जब एक संस्था की ओर से मुझे ‘मुक्तिबोध-स्मृति-समारोह’ का निमंत्रण मिला तो मैं कुछ स्पष्टोक्तियाँ करने से न रह सका। मैंने लिखा—

“मुक्तिबोध की याद करना और उनकी याद में बैठक करना दोनों बातें समझ में आती हैं। पर यह समझ में नहीं आता कि जिस व्यक्ति ने साहित्य में नयी सड़क बनाने के लिए मिट्टी काटना और रोड़े पीटना तक स्वीकार किया हो, उसकी याद गद्देदार कुर्सियों पर बैठकर की जाए और मुक्तिबोध की भी हालत वही कर दी जाए जो तीन-चार सौ साल पहले सनातनी पंडितों ने क्रांतिकारी कवि तुलसीदास की कर दी थी। अर्थात उन्हें पूर्व-प्रचलित स्थापित समाज का ही अंग मानकर स्वीकार कर लिया जाए। नहीं, ऐसी कोई भी बात मुक्तिबोध के विरुद्ध ही पड़ेगी। मुक्तिबोध अभाव में रहे, उनकी यादगार की गोष्ठी में वैभव का प्रदर्शन नहीं होना चाहिए। कम-से-कम वह गोष्ठी वैभव के प्रदर्शन पर समाप्त नहीं हो जानी चाहिए अर्थात् जो रुपया हम-आप इकट्ठा करके इस दो दिन के मेले में बहाने की सोचते हैं, उस रुपये से मुक्तिबोध की कुछ और रचनाएँ छापकर साहित्य के अखाड़े में खड़ी कर देनी चाहिए। 11 सितम्बर को उनका प्रकाशन हो जाए तो क्या कहना! फिर आप ज़रूर गम्भीर चर्चा के लिए एक गोष्ठी भी करें, चाहे भोपाल में, चाहे उज्जैन में, चाहे राजनांद गाँव में। पर गोष्ठी में वे ही सम्मिलित हों जिनके हृदय में मुक्तिबोध के प्रति भाव भी हो और स्वयं सारा ख़र्च वहन करके वहाँ तक पहुँचकर उसका प्रमाण भी दे सकते हों। जो इतना भी नहीं कर सकते, वे मुक्तिबोध के साहित्य की चर्चा करने के अधिकारी नहीं है, ऐसा मेरी ओर से मान लीजिए।”

क्या सचमुच मुक्तिबोध को समझना ऐसा ही कठिन है?

[रचनाकाल 1965, ‘लहार’ में प्रकाशित, ‘प्रसंगवश’ में संकलित]