शमशेर बहादुर सिंह को मुक्तिबोध का पत्र

घर न० 86, विष्णु दाजी गली,
नई शुक्रवारी, सरकल न० 2
नागपुर

प्रिय शमशेर,

कुछ दिन पूर्व श्री प्रभाकर पुराणिक को लिखे पत्र में आपने जो मुझे याद फ़रमाया, उससे प्रेरित होकर ही यह बन्दा दस्ताबस्ता हाज़िर हुआ है। भूले न होंगे आप कि कुछ महीनों पहिले नेमिचन्दजी को मेरे लिखे एक पत्र के साथ आपको भी एक चिट्ठी थी। उसका जवाब दिया ही नहीं जा सकता था, चुनाँचे मैं यह सोचकर चुप बैठ गया था कि ज़माने के फेर में चिट्ठियों के जबाव भी ग़ायब हुआ करते हैं। लेकिन एक अर्से बाद, पुराणिक को लिखे पत्र में जो मेरा नाम आया तो आपको गाली देता हुआ भी मैं बहुत ख़ुश था कि आख़िर किसी के ख़याल में तो हूँ। नेमिचन्द जी को अब फ़ुर्सत नहीं कि कुछ भटकी हुई यादों की भी सुनवाई कर सकें। इधर भूले-भरमे राहगीरों की ज़बानी जो कुछ सुना, वह इतना ही है कि पुस्तक भण्डार मज़े का चल रहा है। समाचार न इससे ज़्यादा, न कम।

बहरहाल, आप तो मज़े में हैं। नया साहित्य में कोरिया पर आपकी कविता पढ़ी। सच कहूँ, बहुत अच्छी लगी। अपनी सहूलियत के लिए मैंने कविता की दो श्रेणियाँ कर ली हैं। एक वह जो सुनायी जा सके और दूसरी वह जो पढ़ी जाने के लिए ही हो। इन दो के बीच में मिले-जुले प्रकार की कविताएँ आती हैं। कोरिया पर आपकी कविता सिर्फ़ पढ़ी जाने के लिए है। नागार्जुन की कविता मामूली है। नेमिचन्दजी की कविताएँ आप लोग प्रकाशित क्यों नहीं करते! क्या सचमुच नया साहित्य वालों की कविता से दुश्मनी है?

बाक़ी सब ठीक है। कभी तो चिट्ठी लिखा करो यार। नेमिचन्दजी को अब हम कभी लिखनेवाले नहीं। सोचो तो, उनका पिछला पत्र अपने शीर्षक के पास एक जनवरी उन्नीस सौ पचास झलका रहा है। क्या सचमुच उनके पास इतनी झंझटें हैं! हमसे तो ज़्यादा न होंगी।

इतना तो जाने हुए हैं कि आप हमें भूल नहीं सकते। कभी नागपुर आओ न यार। बहुत बातें होंगी। पिछले दिनों अमृतराय यहाँ आए हुए थे। उनके ज़रिये काफ़ी बातें मालूम हुईं।

अपने जगत् शंखधर, सुनते हैं, सरस्वती प्रेस में आबाद हैं। कभी मिलते हैं? अगर मिलें तो भई उनसे हमारे स्नेह-नमस्ते कहना। त्रिलोचन ने मुझे सन्देश भिजवाया था। पर बनारस का उसका पता मुझे बिलकुल मालूम नहीं। चिट्ठी लिखूँ तो कहाँ! इलाहाबाद में उसके लिए कहीं जगह तजवीज़ करो न।

बाक़ी यहाँ कुशल है। बाल-बच्चे मज़े में हैं।

हमारे एक मित्र श्री रामरतन मिकची यहाँ से युग जीवन नामक एक द्वैमासिक पत्र निकाल रहे हैं। समता के दूसरे अंक के लिए आपकी एक ‘किसान’ (कुछ ऐसा ही नाम था) कविता मरे पास पड़ी हुई थी। पता नहीं क्या हुआ उसका। अभी कुछ ही दिनों पहले मैंने उसे देखी थी। ख़ैर! मैं चाहता हूँ कि मेरे मित्र के नाते के कह लो, या एक प्रोग्रेसिव के नाते, आप कुछ अपनी चीज़ें मेरे पास अवश्य और शीघ्र भेजें और यदि स्वयं नैमिजी भेज सकें या आप स्वयं उनकी उतारकर भेज सकें तो मेरा भाग्य खुल जाएगा। इसका अगले पत्र में स्पष्टीकरण करूँगा, पहले आप उन्हें शीघ्राति भेज दें।

अगर, वस्तुतः आपने कष्ट किए तो निस्सन्देह मैं ऋणी रहूँगा। मेरा उसमें ख़ास इन्टरेस्ट है।

पत्र का उत्तर दें।

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