मुर्दहिया दलित साहित्यकार डॉ॰ तुलसीराम की आत्मकथा है। ‘मुर्दहिया’ अनूठी साहित्यिक कृति होने के साथ ही पूर्वी उत्तर प्रदेश के दलितों की जीवन स्थितियों तथा इस क्षेत्र में वाम आंदोलन की सरगर्मियों का जीवंत ख़ज़ाना है। ‘मुर्दहिया’ में डॉ. तुलसीराम ने एक साथ दो पीड़ाओं की अभिव्यक्ति की है। इनमें से एक तो जातिगत भेदभाव जनित पीड़ा है जो उन्हें समाज में झेलनी पड़ी। वहीं दूसरी पीड़ा उनके एक आँख के चले जाने के बाद झेलनी पड़ी। ख़ास यह कि यह पीड़ा देने वालों में उनका अपना परिवार भी शामिल रहा जो उन्हें ‘कनवा’ कहकर सम्बोधित करता था। 13 फ़रवरी को डॉ. तुलसीराम की पुण्यतिथि पर पढ़िए इस आत्मकथा से एक अंश। किताब राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुई है।

छुट्टी के दिन दलित बस्ती के अन्य बच्चों के साथ मैं भी गोरू यानी घर के पालतू जानवरों गाय, भैंस और बकरियों को चराने के लिए ले जाता था, या यूँ कहिए कि चराने जाना पड़ता था। संयोगवश दूब वाली घास की चरागाहें मुर्दहिया के ही जंगली क्षेत्र में थीं। इसलिए वहीं चराने की मजबूरी थी। गर्मियों के दिन में इन जानवरों को चराते समय कभी-कभी एक अनहोनी हो जाती थी, वह थी सियारों द्वारा बकरियों का अचानक मुँह से गला दबाकर मार डालना।

हम बच्चे जानवरों को चरने के लिए छोड़ छोटे-छोटे पेड़ों पर चढ़कर ‘लखनी’ अथवा ‘ओल्हापाती’ नामक खेल खेलने लगते थे। इस खेल में एक-दो फीट-पतली लकड़ी पेड़ के नीचे रख दी जाती, फिर एक लड़का पेड़ से कूदकर उस लकड़ी जिसे ‘लखनी’ कहा जाता था, को उठाकर अपनी एक टाँग ऊपर करके उसके नीचे से फेंककर पेड़ पर पुनः चढ़ जाता था। जहाँ लखनी गिरती थी, पेड़ के नीचे खड़ा दूसरा लड़का उसे उठाकर दौड़ता हुआ पुनः पेड़ के नीचे आकर उसी लखनी से पहले वाले को ज़मीन से ऊपर कूदकर छूने की कोशिश करता, वह भी सिर्फ़ एक बार में। यदि उसे छू लिया तो पेड़ चढ़े लड़के को मान लिया जाता कि वह अब ‘मर’ चुका है, इसलिए वह खेल से बाहर हो जाता था। फिर लखनी से छूने वाला लड़का विजेता हो जाता। इस ‘मरे’ हुए लड़के को पेड़ के नीचे खड़ा होना पड़ता तथा विजेता पेड़ पर चढ़ जाता और खेल की वही प्रक्रिया पुनः दोहरायी जाती। परिणामस्वरूप कोई मरता और कोई विजेता बनता रहता। मुर्दहिया पर खेला जाने वाला यह खेल हम बच्चों के बीच अत्यंत मनोरंजक होता था, किन्तु इसी मनोरंजन के दौरान प्रायः सियारों का बकरियों पर हमला हो जाता था और बकरियों का गला उनके तेज़ जबड़ों में दबते ही वे मुश्किल से मात्र एक बार ज़ोर-ज़ोर से बें-बें करके शांत हो जातीं। उनकी ये बें-बें सुनकर जब तक हम बच्चे अपनी लाठियाँ लेकर सियारों को दौड़ाकर भगाते, तब तक उन बकरियों की कथित ‘आत्मा’ को वास्तविक शांति मिल चुकी होती।

लखनी का हमारा यह खेल भुतही मुर्दहिया को फिर से मंचित कर देता। हम सभी बच्चे मरी बकरी को ठिठराते हुए बस्ती में डरते-डरते आते। ऐसी बकरियों की मसालेदार दावतें तो लोग ख़ूब उड़ाते, किन्तु बकरी चराने वाले बच्चे की पिटाई हर दावत के पहले एक आवश्यक कर्मकांड बन चुका था।

एक बार हमारा एक बकरा इसी लखनी के खेल में सियारों का शिकार बन गया। यह बकरा मनौती वाला था, जिसकी बलि चमरिया माई को देनी थी। जब मैं उसी ठिठराने की प्रक्रिया से बकरे को लेकर घर पहुँचा तो वही पूर्वोक्त आवश्यक कर्मकांड शुरू हो गया। ऐसे कर्मकांडों के शास्वत पुरोहित वही मेरे अति ग़ुस्सैल नग्गर चाचा हुआ करते थे। मेरी तत्काल जो धुनाई हुई, वह तो हुई ही, किन्तु कई दिनों तक समय-समय पर चेचक की शिकार मेरी ज्योतिविहीन दाईं आँख उनके रौद्र संचालित ज़बान का असली निशाना बनी रही। बार-बार दोहराई जाने वाली वह पुरानी ‘कनवा-कनवा’ की बौछार उन सियारों के जबड़ों से कई गुना ज़्यादा तेज़ी से मेरे मस्तिष्क को बेधती थी। चूँकि वह चमरिया माई को बलि चढ़ाने वाला मनौती का बकरा था, इसलिए किसी अनहोनी का मानसिक भय काफ़ी दिनों तक मुझे सताता रहा। दादी ने अगियारी करनी शुरू कर दी। उसने चमरिया माई का बार-बार जाप करते हुए एक दूसरे बकरे के साथ छौना, यानी सूअर के बच्चे की भी बलि चढ़ाने की मनौती की, साथ ही मुझे माफ़ कर देने की भी विनती की। दादी कहती थी कि चमरिया माई को छौना बहुत पसंद है, इसलिए उसकी बलि पहले दी जाएगी।

कुछ दिनों के बाद लगभग चार किलो का एक छौना ख़रीदा गया। दादी ने कहा कि इसकी बलि मेरे ही हाथों दी जाएगी, तभी चमरिया माई मुझे माफ़ करेंगी। मैं बहुत घबराया हुआ था। इसलिए बलि देने में मुझे ज़रा भी हिचक नहीं हुई। उस छौने को हम चमरिया माई के उसी कंटीली झाड़ी वाले टीले पर ले गए। इस टीले को ‘कोटिया माई’ का थान भी कहा जाता था। मेरे एक चचेरे भाई चौधरी चाचा के सबसे छोटे बेटे सोबरन मेरे साथ लाठी लेकर गए। वे छौना को लिटाकर लाठी को उसके पेट के बीचोबीच रखकर ताक़त के साथ उसे दबा रखा ताकि वह उछले नहीं। लाठी से दबाते समय छौना ज़ोर-ज़ोर से चोकरने लगा। मैं बिल्कुल डर गया, किन्तु दादी की हिदायत के अनुसार मैंने हिम्मत जुटाकर साथ ले गए एक छोटे से गंड़ासे को फिर से पत्थर पर घिसकर उसकी धार को और तेज़ किया और एक बार ज़ोर से बोला, “बोला बोला चमरिया माई की जै।”

मेरे साथ यह नारा सोबरन भैया ने भी दोहराया, फिर मैंने गंड़ासे को छौने की नटई की तरफ़ खड़ा करके आँखें मूँदकर अंधाधुंध रेतने लगा। छौने का चोकरना कई बार तेज़ होकर शीघ्र ही शांत हो गया और उसकी गर्दन बिल्कुल अलग।

मैंने दादी के कहने के ही अनुसार बहते हुए ख़ून को हाथ में रोपकर चमरिया माई के थान पर रखे हुए मिट्टी के हाथी घोड़ों के ऊपर छिड़क दिया और सियार द्वारा बलि के बकरे को मार डालने के अपने गुनाह के लिए उनकी विनती की।

इसके बाद हम बलि चढ़ाये छौने को लेकर घर वापस आ गए। हमारे घर के सभी लोग सूअर का माँस खाते थे, किन्तु एक परम्परा के अनुसार जहाँ रोज़ का खाना मिट्टी से बने चूल्हे पर लकड़ी जलाकर पकाया जाता, वहाँ इसे कभी नहीं पकाया जाता, जबकि मुर्ग़ा, मछली तथा बकरे का माँस वहाँ पकता था। सूअर का माँस हमेशा घर के बाहर खुले मैदान में ईंट का चूल्हा बनाकर बड़े हंडे में पकाया जाता था। सूअर का माँस हमेशा मुन्नर चाचा पकाते और सबको वे ही बाँटते भी थे। उस दिन जब मेरे द्वारा बलि वाला छौना पकाया जा रहा था, तो मुन्नर चाचा ने मुझे एक छोटा-सा बाँस का सोटा पकड़ाकर कहा कि बटुले (हंडा) की तरफ़ ध्यान से देखते रहना, वरना सूअर का बच्चा निकलकर भाग जाएगा। मैं छौने के भाग जाने की उस कल्पित सम्भावना से चिन्ताग्रस्त होकर बड़ी मुस्तैदी से वहाँ खड़ा रहता। मुझे बार-बार यह संदेह होता कि जिस छौने को मैंने ही काटा है, वह पकते समय बटुले से निकलकर कैसे भाग सकता है, किन्तु घर के उस घोर अंधविश्वासी वातावरण में मैं इस कोरी कल्पना को भी अकाट्य सत्य समझने पर मजबूर था। मुझे यह मनोवैज्ञानिक भय भी सताता रहता कि यदि छौना बटुले से भाग गया, तो ग़ुस्सैल नग्गर चाचा का मुक़ाबला कैसे करूँगा? मुझे बाद में समझ में आया कि मुन्नर चाचा का वह एक निर्दोष मज़ाक़ था। बाद में बस्ती के अन्य लोगों में यह मज़ाक़ फैल गया और लोग इस घटना को दोहरा-दोहराकर ख़ूब मज़ा लेने लगे। किन्तु जब तक मैं इस मज़ाक़ में निहित मनोरंजन की सच्चाई को समझूँ, उसके पहले लाठी लेकर सूअर पकते बटुले की कई बार रखवाली कर चुका था। मेरी दादी भी ख़ूब हँसती और कहती, “त मुरूख हउवे रे।”

इस तरह की एक विचित्र मूर्खता का शिकार मैं लगभग उसके कुछ ही दिन बाद कक्षा तीन में पढ़ते हुए स्कूल में बन गया था। मेरी कक्षा के सहपाठी मुल्कू ने एक दिन अपने गाँव हनौता से बड़े-बड़े बेर के फल लाए थे। उन्होंने कुछ बेर मुझे भी दिया। एक बेर खाते-खाते उसका बीज भी अचानक घोंट लिया। साथ ही बेर खा रहे मुल्कू ने जब बेर का बीज घोटते हुए देखा, तो तुरंत उन्होंने अन्य बच्चों से कहना शुरू कर दिया कि इसने (मैंने) बेर का बीया (गुठली) घोंट लिया है और अब इसके पेट को फाड़कर बेर का पेड़ निकलेगा। इतना सुनते ही अन्य बच्चे भी इस ‘सत्य’ को दोहराने लगे। डर के मारे मैं बेहाल हो गया। कई दिनों तक पेट से पेड़ निकलने की आशंका से ग्रस्त होकर ठीक से सो नहीं सका। डर के मारे घर में भी किसी से कुछ न बताया। चुपके से चमरिया माई को धार और पुजौरा चढ़ाने की मनौती माना और विनती की कि हे चेमरिया माई! उस सम्भावित पेड़ को पेट में नष्ट कर दे। कई दिनों बाद कक्षा के मेरे सबसे गहरे साथी संकठा सिंह, जिन्होंने मुझे अक्षर लिखना सिखाया था, के समझाने पर मैं समझ पाया कि पेट में किसी भी बीज से पेड़ नहीं निकलता। मैंने बाद में चमरिया माई को मनौती वाला धार-पुजौरा उसी स्थान पर जाकर चढ़ाया। इस घटना के बाद कई वर्षों तक मैं मनोवैज्ञानिक भय के कारण बेर खाने से घबराता रहा। सूअर पकते बटुले की रखवाली तथा पेट से बेर के पेड़ के उगने की सम्भावना वाली मूर्खताओं को याद करके मैं आज भी एक विचित्र ढंग से स्वयं को गौरवान्वित महसूस करता हूँ।

न् 1957 का वर्ष मेरे साथ-साथ गाँव की सारी बस्ती के लिए बहुत घटनाप्रधान था। मुर्दहिया के पास वाली सीवान भर्थैया के घने जंगल में हमारे गाँव के एक अहीर पौहारी बाबा (पावहारी बाबा) एक झोंपड़ी बनाकर रहते थे। उनकी झोंपड़ी से आधा किलोमीटर दूर एक पेड़ के नीचे मचान बनाकर पड़ोसी गाँव टड़वाँ के एक ‘फक्कड़ बाबा’ रहते थे। फक्कड़ बाबा लगभग नंग-धडंग रहते थे। वे सिर्फ़ एक डेढ़ फीट लम्बी पतली-सी कपड़े की चीर आगे-पीछे अपनी करधनी में लपेटे रहते थे। पूरी देह में वे कंडे की राख हमेशा पोते रहते थे। जाड़े के दिनों में भी वे बिना कुछ ओढ़े सोते थे तथा किसी से कभी कुछ नहीं बोलते। वे पूर्णरूपेण मौनव्रती थे। उनके बारे में तरह-तरह की किंवदंतियां फैली हुई थीं। कोई कहता कि वे भूतपूजक हैं, तो कोई उन्हें साक्षात ज़िन्दा भूत समझता। उनके मचान के आसपास कोई कभी नहीं जाता, ख़ास करके जंगल में घास काटने वाली औरतें उनसे बहुत डरती थीं, क्योंकि उनके बारे में यह भी प्रचलित था कि वे औरतों को सम्मोहित करके देह शोषण करते हैं। वे कभी-कभी घूमते हुए हमारे गाँव भी आते थे और लोग उन्हें पैसा और सिद्धा (आटा, दाल आदि) देते। वे बिना कुछ बोले उसे लेकर वापस चले जाते। वे प्रतिदिन मिट्टी की हंड़िया में कंडे की आग पर दिन में सिर्फ़ एक बार खाना पकाकर खाते।

इन तमाम विचित्रताओं के बीच एक दिन फक्कड़ बाबा को घसियारों ने मचान के बाहर मरा पड़ा देखा। शीघ्र ही उनके मरने की ख़बर क्षेत्र के अनेक गाँवों में फैल गई। धीरे-धीरे उनके मचान के पास गाँव का गाँव उमड़ पड़ा, हज़ारों की भीड़ लग गई। क्योंकि फक्कड़ बाबा इन तमाम विवादमय अफ़वाहों के बीच चहुंदिश चर्चा में हमेशा बने रहते थे। मेरे पिता जी भी उनकी लाश को देखने गए थे। लौटकर उन्होंने बताया कि कुछ आदमी रात में उन्हें ‘घाठा लउर’ देकर मार डाले थे, शायद पैसों के लालच में। ‘घाठा लउर’ के बारे में पिता जी ने परिभाषित करते हुए बताया कि दो लाठियों के बीच आदमी की नटई दबाकर उसका दम घोट दिया जाता है। इसी को घाठा लउर कहा जाता है जिससे बहुत घुट-घुटकर तकलीफ़ के बाद कोई आदमी मरता है और आवाज़ नहीं निकलती। पिता जी ने यह भी बताया कि ‘घाठा लउर’ से मारे जाने की पहचान मृतक के गले में नीला निशान बन जाने तथा जीभ के मुँह से बाहर निकल जाने से होती है, जैसा कि फक्कड़ बाबा के साथ हुआ था। फक्कड़ बाबा की हत्या से हमारे गाँव में बड़ी दहशत फैल गई। अफ़वाह उड़ गई कि इलाक़े के सारे भूत आएँगे और इकट्ठा होकर लोगों से चुन-चुनकर फक्कड़ बाबा की हत्या का बदला लेंगे। भूतों का भय इतना फैल गया कि लोगों का भर्थैया की तरफ़ जाना बंद हो गया।

हमारे गाँव के कई दलित भूतों की पूजा करते थे और उनमें से हर एक के भूत बाबा अलग-अलग पीपल के पेड़ों पर रहते थे। हमारे घर के भूतबाबा वहीं पड़ोसी गाँव दौलताबाद के पास वाले पुराने पीपल के पेड़ पर रहते थे। उस भूतबाबा को ख़ुश करने के लिए फक्कड़ बाबा की हत्या के बाद पहली बार मुन्नर चाचा मुझे अपने साथ ले गए। हम लोग साथ में एक हंड़िया दूध, एक सेर चावल तथा कुछ भेली और गाय-बैल के गोबर से बने हुए सूखे गोइंठे को भी ले गए थे। गोइंठे का अहरा लगाकर हंड़िया के दूध में चावल और भेली डालकर ‘जाउर’ (खीर) पकायी गई, जिसमें से थोड़ा उस भूतबाबा वाले पीपल के पेड़ की जड़ पर चढ़ाया गया तथा एक लंगोट उसकी एक डाली में उस पर चढ़कर मैंने बांध दिया। शेष जाउर को घर लाया गया जिसे परिवार के सभी लोग प्रसाद के रूप में खाए। इस चढ़ावे के बाद दादी का कहना था कि अब फक्कड़ बाबा की हत्या का बदला लेने वाले किसी अन्य भूत को हमारे ख़ानदानी भूतबाबा हमारे परिवार के आसपास नहीं फटकने देंगे। दादी की इस बात से घर के सारे लोग पूर्णरूपेण आश्वस्त हो गए थे।

बाद में ऐसी पूजाओं के लिए मुझे अकेला भेजा जाने लगा था। इस तरह की पूजाओं में भाग लेने के कारण मेरे अंदर एक अलग ढंग का विश्वास जगने लगा जिसके कारण धीरे-धीरे मेरे मस्तिष्क से भूतों का डर दूर होने लगा। क्योंकि मुझे पूरा विश्वास होने लगा कि जब मैं स्वयं भूतबाबा को जाउर तथा लंगोट चढ़ाने जाता हूँ, तो फिर उनसे डर कैसा?

इसी बीच वर्षा के दिनों में मेरे सिद्धहस्त ‘मछरमरवा’ पिता जी ने गाँव के ताल के अंदर एक अखन्हा बांधा। पानी के अंदर गीली मिट्टी से गोल दीवार उठाकर पानी की सतह तक लाकर उसके ऊपर का हिस्सा हाथ से लीपकर चिकना बना दिया जाता है तथा गोल गड्ढे से छोटी हंड़िया से पानी निकालकर ख़ाली कर दिया जाता है। इसी को अखन्हा बांधना कहते हैं। इस तरह के अखन्हा में मछलियाँ वहाँ से गुज़रते हुए उसमें कूदने लगती हैं। पिता जी एक दिन रात में ऐसे ही ताल के एक अखन्हा से गगरी भरकर मंगुर तथा गिरई लेकर आ रहे थे। ताल के पास ही परसा नाम की सीवान में स्थित उस भुतहे पीपल के पास ही कुछ आम के पेड़ थे। रास्ता इन्हीं पेड़ों से होकर हमारे घर की तरफ़ आता था। पेड़ के पास पहुँचते ही पिता जी गगरी भरी मछलियाँ पटककर हाँफते हुए भागकर घर पहुँचे। उनकी हालत बहुत ख़राब थी। पूछने पर घरवालों को उन्होंने डरते हुए बताया कि परसा का भूत आम के पेड़ों पर एक-एक पत्ती पर दीया जलाए हुए था। इसलिए किसी अनहोनी से डरकर मैं गगरी वहीं पटक भाग आया। लोग बड़ी आसानी से विश्वास कर लिए। मैं भी उस रात बहुत डरा हुआ था। किन्तु यह तथ्य मेरे दिमाग़ में एक संदेह अवश्य पैदा किए हुए था कि इतने अधिक चिराग़ पेड़ पर कैसे जलेंगे? ठीक दूसरे दिन दलित बस्ती के आसपास के पेड़ों पर रात में देखा कि हज़ारों जुगनू जलते-बुझते, चमकते हुए साफ़ नज़र आ रहे थे। मैंने दादी को बताया कि लगता है, इन्हीं जुगनुओं को पिता जी ने परसा के भूत का दीया जलाना समझ लिया था। दादी ने मेरा हवाला देकर यह बात घर में सबको बतायी। यह बात सुनकर नग्गर चाचा अपने पुराने ढर्रे वाली शाबाशी देते हुए बोल पड़े: “कनवा एकदम सही कहत हौ।”

शायद यह मेरे जीवन की पहली बुद्धिवादी तर्कणा थी।

डॉ॰ तुलसीराम की आत्मकथा 'मुर्दहिया' और 'मणिकर्णिका' से उद्धरण यहाँ पढ़ें

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