मुठ्ठी भर बचपन

लाल रंग की गेंदें
भेज दी गयी हैं कारखानों में
जहाँ भरी जाती है अब
उनमें बारूद

सारे बल्ले, बनाये जा रहे हैं
अब बन्दूकें

अब दोनों मिल कर
मैदान में डट कर स्कोर नहीं बनाते

गिनते हैं लाशों के आँकड़े

कंकरीट के जंगलों ने
निगल लिये हैं सारे मैदान

मिट्टी के खिलौनों की जान
रोबोट में प्रत्यारोपित कर दी गयी

बस्तों के बोझ ने छील दी है
पीठ बचपने की

ज्ञान के कारखानों में
तैयार किये जा रहे हैं कुशल उत्पाद
जिनकी सम्वेदनाओं से टूट गयी है
तारतम्यता

अब जबकि मासूमियत खिसक रही है
सभ्यता की हथेली से
ऐसे निराश समय में आवश्यकता है
बचा लेने की-
कुछ खिलौनें
गिलहरी, तितलियाँ
घोंसले, थोड़ी सी मिट्टी
और मुठ्ठी भर बचपन।

© Rashmi Saxena