‘Naam’, a poem by Vikas Sharma

मेरी दादी के
हाथ पर
एक नाम गुदा था…

भोली…।

हम बच्चे
जब अपने नन्हे हाथों से
उस नाम को
सहलाते थे,
दादी की आँखें
चमक उठती थीं
जैसे टॉर्च का बटन
दबाया गया हो।

एक उदास-सी
मुस्कान उनके होंठों पर
फैल जाती थी,
और
उन्हें दस साल की बच्ची
बनाकर
लायलपुर के उसी मेले में
छोड़ आती थी।

बोल उठती थीं
वे
“उसने भी मेरा नाम
उर्दू में लिखवाया था।”

“उनका हिन्दी में
आपका उर्दू में
क्यों???”

इस पहेली से हम बच्चे
परेशान थे।
वो हँसकर कहतीं-

“अरे पगलो,
मेरे बाबा हिन्दू
उसके अब्बा मुसलमान
थे।

लेकिन
मज़हब हम दोनों के लिए
बस
एक नाम था।
हमें तो अपने
रिश्ते से
काम था।

फिर बँटवारा हुआ
हम दूर हुए

फिर…
फ़ासले बढ़ गए।
ऐसे
कितने ही रिश्ते
सियासत की बलि
चढ़ गए।

सोचती हूँ
भोली के नाती-पोते भी
मेरा नाम वहाँ
सहलाते होंगे
और
तुम जैसे ही
एक अनकहा, अनजाना रिश्ता
निभाते होंगे।”

मेरी दादी के हाथ पर
लिखा
सिर्फ़ एक नाम था
या
कोई मोहब्बतों का
पैग़ाम था?!

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विकास शर्मा
विकास शर्मा (जन्म २७ मई १९६४) हनुमानगढ़ (राजस्थान) शिक्षा: BE (Mech); MBA विकास भारत की बड़ी कंपनियों में उच्च पदों पर कार्य कर चुके हैं और अभी पंजाब स्थित तलवंडी साबो पावर लिमिटेड में सीईओ के पद पर कार्यरत हैं. विकास को पेंटिंग, संगीत एवं लिखने का शौक़ है. उनकी कविताएँ दैनिक पत्रों में छप चुकी हैं.