नदी : नौ कविताएँ

1

नदी को देखना
नदी को जानना नहीं है
नदी को छूना
नदी को पाना नहीं है
नदी के साथ सम्वाद
नदी की तरह भीगना नहीं है
नदी की तरह होने के लिए
नदी के उद्गम स्थल तक पहुँचना नहीं है
सड़क पर और किसी गली में
नदी की तरह बहा जा सकता है
नदी की जिजीविषा लेकर।

2

चाँद घुल रहा है नदी में
समय अपना पाप
नदी में धोता है
यही नदी का सौन्दर्य है
नदी गतिमान है उस समय
जब जड़ हो चुकी हैं सम्भावनाएँ
जब सभी आत्माएँ आकाशगंगा
की ओर ताक रही हैं
नदी पलायन के ख़िलाफ़
अपनी देह को अधिक
धँसा रही है इसी घरती में।

3

वह शहर
जिसने नदी की हत्या की है
हताश है
उसकी नींद पत्थर में बदल गयी है
एक मरी हुई नदी को जलाया नहीं जाता
वह शहर अभिशप्त है
जो मरी हुई नदी के साथ जीता है
नदी की हत्या करने के बाद
वह शहर
मनुष्यों की हत्या करता है।

4

पुरुष का अन्धेरापन
कम करती है औरत
औरत के अन्धेरेपन को
कम करता है पेड़
पेड़ के अन्धेरेपन को
कम करती है आकाशगंगा
तारों का जो अन्धेरापन है
उसे सोख लेती है नदी
नदी के अन्धेरे को
मछली अपने आँख में टाँक लेती है
इस तरह यह विश्वास बना रहता है
कि अन्धेरे के ख़िलाफ़
एक नदी बहती है।

5

नदी पानी की एक चादर है
जिसे ओढ़ लिया करती है असंख्य मछलियाँ
नदी कभी लौटती नहीं है
नदी के पाँव किसी ने देखे नहीं हैं
मेरे मुहल्ले की एक लड़की
नदी में पाँव डालकर घण्टों बैठती थी
उसके पैर कमल के फूल हो गए
बारिश से भीगी नदी
इस धरती की पहली लड़की है
जिसके हाथ बहुत ठण्डे थे
नदी का बचना
उस ठण्डे हाथ वाली लड़की का बचना
मुश्किल है इन दिनों।

6

वह नदी चाँद पर बहती है
किसी खाई में
वह नदी
धरती पर बहने वाली
किसी पठारी नदी की जुड़वा है
वह पठारी नदी जब गर्मियों में हाँफती है
वह नदी जो चाँद पर बहती है
उसकी आँखों से झड़ते है आँसू
और तारें टूटते हैं
मैं तारों को टूटते देखता हूँ
तारों का टूटना
नदी का मिलना है
मेरी कविता में
नदी ऐसे ही मिलती है
जब नदी मिलती है
उसकी वनस्पतियों का रंग अधिक
हरा हो जाता है
यहीं से लेता हूँ मैं हरापन
उन लोगों के लिए
उस पेड़ के लिए
जहाँ फैल रहा है पीलापन।

7

पिता ने कहा था
अपने कठिन दिनों में
कुछ माँगना नहीं
बिलकुल नदी की तरह
नदी और तुम दोनों
एक ही गोत्र के हो
तब से मैंने शामिल किया
नदी को अपने जीवन में
और बाँटता रहा
उसके साथ अपना लेमनचूस
पर नदी के स्वाद को नहीं जान सका
मैं जी लूँगा ऐसे संशय के साथ
नदी ने मेरे अन्दर नहीं भरी रेत
इस बात को लेकर आश्वस्त हूँ
रेत न होना नदी होना है
पिता ने कहा एक दिन।

8

नदी सो रही है
रेत पर
भीगती हुई
ख़ाली पाँव
वह मज़दूर लड़की
भी एक नदी है
खेत में खोयी है
भीग रही है ओस से
एक भीगती हुई नदी
एक भीगती हुई लड़की
हमशक्ल हैं
हँसती हुई वह लड़की
इस समय
एक बहती हुई नदी है।

9

क्यूल नदी मर रही है
उसके नब्ज़ में
कीचड़ भर गई है
वह शहर
लखीसराय
जिसके बाल सुनहले थे
क्यूल नदी की सुनहरी रेत
में कभी भीगते थे
एक सूखती हुई नदी
एक धँसते हुए शहर
का संघर्ष
पठार और पहाड़ जानते हैं
बहरहाल बहुत दूर
एक शहर दावोस
जिसकी जीभ पर बर्फ़ जमी है
दार्शनिक की मुद्रा में
चुपचाप बैठा है
तमतमाए चेहरों
और जाड़े की रात जैसे
लम्बे सम्वाद से
शहर की बर्फ़ पिघल रही है
दावोस की कार्यसूची में
क्यूल नदी के लिए
उस शहर की पिघलती
बर्फ़ नहीं है
क्यूल नदी की सुनहरी रेत
शहर दावोस के
बालों के लिए नहीं है
सुनो वह शहर दावोस
हाँफ रहा है लोगों की भीड़ से
एक क्यूल नदी मर रही है
असमय
दुनिया के सम्वाद से बाहर।

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रोहित ठाकुर
जन्म तिथि - 06/12/1978; शैक्षणिक योग्यता - परा-स्नातक राजनीति विज्ञान; निवास: पटना, बिहार | विभिन्न प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्र पत्रिकाओं बया, हंस, वागर्थ, पूर्वग्रह ,दोआबा , तद्भव, कथादेश, आजकल, मधुमती आदि में कविताएँ प्रकाशित | विभिन्न प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों - हिन्दुस्तान, प्रभात खबर, अमर उजाला आदि में कविताएँ प्रकाशित | 50 से अधिक ब्लॉगों पर कविताएँ प्रकाशित | कविताओं का मराठी और पंजाबी भाषा में अनुवाद प्रकाशित।