नहीं! डरो मत,
मैं कहीं नहीं जाऊँगी
न एक पल के लिए,
न एक दिन के लिए
मैं इतनी क़रीब हूँ
तुम्हारे कि
दूर जा ही नहीं सकती।
तुम्हारी भीगी पलकें
और उड़ेलें ऑंसू,
यह मुझसे देखा न जाएगा।

तुम भींचना मत
अपनी मुट्ठियाँ
कहीं पसीजती हुई हथेलियों से
रिस न जाऊँ मैं।
खाली हाथ तुम मत रहना,
जानती हूँ कि तुम
हमेशा की तरह उगा लोगे
उम्मीदों की नई कोंपलें।
मुस्कुराने की भी
कोई न कोई वजह
ढूँढ ही लोगे तुम।
कंदराओं में जाकर
चिल्लाऊँगी तुम्हारा नाम
प्रतिध्वनियों में पा लूँगी तुम्हें।
तो डरो मत-
मैं कहीं नहीं जाऊँगी,
क्योंकि-
मेरा वजूद ही है तुमसे,
भटकना भी मत मेरी खोज में
घबरायी हूँ कहीं इन सब में
समय न कर दो व्यर्थ
कि-
महसूस ही न कर पाओ मुझे,
मैं कहीं जा ही नहीं सकती।

जब कभी मेरी
अधपकी कविता
पढ़ोगे तुम अकेले में
तो पाओगे कि मैं
समाहित हो चुकी हूँ तुम में।
मैं अक्सर सोचती हूँ कि
तुम्हारी साँसों की डोरी पर
झूलते हुए चाँद को खींच लाऊँ,
खिलाऊँ तुम्हें
उसे मीठी रोटी बना कर।
कभी सोचती हूँ कि
पत्थर हो जाऊँ मैं,
लेकिन जानती हूँ कि
तुम तराश दोगे मुझे
एक मूर्ति के रूप में।
मुझे पूजना मत
पूजा जाना बाँधना है
मुझे तो मुक्त होना है
तुम्हारे ख़यालों में।
तुम मानोगे नहीं
शब्द-सुमन अर्पित
करते ही रहोगे।
तो कहाँ जा पाऊँगी मैं
तुम्हें छोड़कर…।

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