‘Navvarsh Naveen Chintan’, a poem by Harshita Panchariya

उन्नीस के अपेक्षाकृत,
मैं समझती हूँ कि
तुम अधिक समझदार बनोगे।
तुमने सीखा है कि
मौक़ापरस्तों से दूरी
रखना हितकर होगा।

हितकर होगा कि तुम पहचानो
तुम्हारी ओर बढ़ते हुए हाथ
मात्र तुम्हें थामने के लिए नहीं बढ़े हैं
और इसीलिए आवश्यक था
पाँव पीछे ले लेने की कला
में भी तुम्हारा माहिर होना।

तुम माहिर हो चुके हो
मक्खियों और मधुमक्खियों
के भेद में।
जहाँ समय पर डंक मारना तुम्हें
उतना ही आवश्यक है,
जितना आवश्यक है
भिनभिनाती मक्खियों के
झुण्ड से स्वयं को तटस्थ रखना।

और तभी निपुण हो पाओगे
कामनाओं और महत्त्वाकांक्षाओं
के बीच झूलते तारों में फँसते
अपने अस्तित्व की सुइयों को
तटस्थ रखने की कुशलता से
परिपूर्ण बन इक्कीसवें साल में
प्रखरता से प्रवेश करने के लिए।

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