विवरण: अनुराधा सिंह ने अपने पहले ही संग्रह की इन कविताओं के मार्फत हिंदी कविता के समकालीन परिदृश्य में एक सार्थक हस्तक्षेप किया है। दीप्त जीवनानुभव, संश्लिष्ट संवेदना और अभिव्यक्ति की सघनता के स्तर पर इन कविताओं में बहुत कुछ ऐसा है जो उनकी एक सार्थक और मौलिक पहचान बनाने में सहायक है। हिंदी कविता में यह बहुत सारे संदर्भों के साथ रच बस कर अपने वजूद की समूची इंटेंसिटी के साथ एक लंबे अरसे बाद सामने आया है- क्या स्त्री मन की ऐसी कोई काव्य अभिव्यक्ति हमें इस समय कहीं और दिखाई देती है जो इस कदर सघन हो, इस कदर विह्वल, जिसमें रिफ्लेक्शन्स भी हों, अभीप्साएं भी, शिकायतें और ज़ख्म भी हों, कसक भी और संभलने की आत्म सजगता भी। इन कविताओं में महज़ स्त्री अस्मिता की ज़मीन या पितृ-सत्तात्मक समाज से संवाद के ही संदर्भ नहीं हैं, ये कविताएँ उससे अधिक इतिहास और जटिल समय की अन्तःवेदना और बेकली की कविताएं हैं। – विजय कुमार

  • Paperback: 120 pages
  • Publisher: Bharatiya Jnanpith (January 2018)
  • Language: Hindi
  • ISBN: 978-81-936555-3-5

 

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पोषम पा
सहज हिन्दी, नहीं महज़ हिन्दी...

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