‘Nazariya’, a poem by Adarsh Bhushan

तुम्हें बेवजह देशद्रोही
ठहरा दिया जाएगा

जब अपना हक़ माँगोगे
घूसे बरसा दिए जाएँगे
तुम्हारे उन्हीं अधरों पर
जिनसे चंद मिनटों पहले
तुमने अपनी पहली आवाज़ उठायी थी,
अपनी स्वायत्तता के लिए
चला देंगे तुम्हारे उसी सर पे लाठी
जिसके अंदर के इस ख़ुराफ़ाती दिमाग़ ने
ख़ुराफ़ात छोड़
अपनी बात करनी चाही थी

किसी किनारे ना लगकर
अपनी सत्यता का प्रमाण देने तक
ठूस दिए जाओगे किसी काले कमरे में
जहाँ तुम्हारी चमड़ी भी
तुम्हारे राष्ट्रप्रेम का
प्रमाण नहीं दे पाएगी।
क्योंकि तुम सिर्फ़ एक भीड़ का अंक थे
और तुम्हारे सामने की भीड़ ने
तुम्हें पक्षधर ठहरा दिया।

फाड़ दिए जाएँगे
तुम्हारे वसन
और तुम्हारे अस्तित्व को
प्रश्न बनाकर छोड़ दिया जाएगा
बस इसलिए क्योंकि तुमने सिर्फ़
अन्याय के ख़िलाफ़ आवाज़ उठायी थी,
पहली बार अपने झूठ के
गिरेबाँ से निकलकर
अपने सच को जाना था,
और ये जो धुंध-सी छायी है न
बस एक छलावा है,
घेर रखी है इसने सिर्फ़
दृष्टि नहीं
दृष्टिकोण ही बदल दिया है।

श्वेत पर्द सा
है पारदर्शी
किन्तु तुम्हारी नज़रें जो छन जाती हैं,
ये मार रही हैं
तुम्हारे अंदर के उस जीव को
जो नज़रअंदाज़ कर देता है,
देखकर भी
सुनकर भी

इसलिए तुम्हारे अस्तित्व का सत्यापित होना
ज़रूरी है
जब तक तुम्हारे अधर
चिपके रहेंगे
तब तक तुम्हारे अस्तित्व पर
प्रश्न उठते रहेंगे।

तुम्हारा इस जंग से किनारे होना
सम्भव ही नहीं
क्योंकि अगर तुम्हारे फड़फड़ाते अधर
आज चुप रहे
तो कल क्या जवाब दोगे?

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