मेरे मिट्टी के घर के पीछे था
वो पेड़ बरसों से
नीम का पेड़
जिस पे खेलते-चढ़ते थे
अक्सर झूलते थे हम
उसी की छांव में गर्मी की अपनी शामें कटती थीं
सर्द दोपहरियों में छन के उससे धूप आती थी
मगर फिर दब गयी सीमेंट में
मिट्टी मेरे घर की
इसी में दफ़्न है अब भी कहीं
उस नीम की लकड़ी…
मुझे इस घर में अक्सर जंगलों के ख़्वाब आते हैं..

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