1

घावों से भरे घर में
मरहम की एक डिबिया है
जो वक़्त पर कभी नहीं मिलती
और अंधेरे में
छटपटाता रह जाता है ज़ख़्मी मन।

2

एक बहती हुई धार में
कुछ दूर बहकर
गली हुई काग़ज़ की नाव
और घुप्प अंधेरे में
इसी तरह मेरा बदन।
खिलखिलाते हुए बच्चे
लौट गए हैं
अपने-अपने घर।

3

कितने जतन करके भी
नहीं खिला सका
नींद की डाल पर
एक फूल-सा स्वप्न
हालाँकि झरबेरियाँ ख़ूब हैं
ख़ूब हैं भटकटैया के पीले फूल
यही कारण है कि
थकन की मेड़ से गुज़रते हुए
छलछला ही आती है
पाँव में उलझन की लाल बूँद।

4

किसी सज़ायाफ़्ता क़ैदी के सिर पर
गिरायी जा रही पानी की
एक-एक बूँद
बदल जाती है सोच की लड़ी में
जिस वक़्त सो रहा होता है थानेदार
ठीक उसी वक़्त जाने कैसे गुम हो जाती है
बेचैनियों के गुच्छे में
नींद की चाबी।

राजकमल चौधरी की कविता 'नींद में भटकता हुआ आदमी'

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शिवम चौबे
बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से स्नातक। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिन्दी साहित्य में परास्नातक। फिलहाल अध्ययनरत। कविताएँ लिखने पढ़ने में रूचि। संपर्क- [email protected]

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