कृष्णा सोबती के संस्मरण संग्रह ‘हम हशमत – भाग 1’ से साभार

बात पुरानी है। तब की जब निर्मल नये थे। वह पुरानी बात नयी तो नहीं रही, फिर भी नयी है। अपना इशारा किस ओर है, यह तो हशमत बाद में बताएँगे ही, जल्दी हमें यह कहने की है कि निर्मल अभी पुराने नहीं हुए। पुरानी तो यह याद है जो निर्मल की सब कहानियों-उपन्यासों के बावजूद एक अलग-थलग अन्दाज़ से हमारे ज़ेहन पर चिपकी हुई है।

उनका पहला उपन्यास ‘वे दिन’ पढ़ते हुए उन्हें ढूँढा किए। उन्हें ढूँढा किए उनके नये उपन्यास ‘लाल टीन की छत’ की पंक्तियों में भी, मगर साहिब वह सुबह हमारे हाथ दुबारा नहीं आयी।

आप पूछना चाहते होंगे कि वह सुबह क्या थी? तो सुनिए—वह सुबह जवान निर्मल की सुबह थी। हमारी मुलाक़ात भी उस सुबह इत्तिफ़ाक़ से ही दिल्ली के एक रेस्तरां के सामने हो गयी थी। जी, तो उस जाड़े की सुबह वहाँ निर्मल वर्मा मौजूद थे और साथ थी निर्मल की वह कहानी जिसका पीछा करने को निर्मल अपनी हर कहानी, हर रचना के साथ दौड़ते रहे हैं।

आप लोगों की मदद करने के लिए हशमत ने दिमाग़ पर बहुत जोर डाला—चाहा उस क़द और नक़्श को तूलिका से आँक सकें, लेकिन मजबूरी कि इस कला में हशमत को कोई दख़ल नहीं। हारकर सोचने लगे—क्या वह चेहरा निर्मल के साथ हमें फिर कभी दिखायी दिया?

जी नहीं, कभी नहीं दीखा। हाँ, जब-तब, निर्मल से मिलने पर ज़रूर लगता रहा कि वह चेहरा निर्मल के साथ, निर्मल के तौर-तरीक़े, उसके कपड़ों और पुलओवर में सगेपन से सिमटा पड़ा है। उसके हाथों में उलझा पड़ा है।

वह चेहरा दरअसल उन आँखों का था जो पहली बार नयी ज़िन्दगी का सपना देखती हैं। देखने लगती हैं तो दुनिया पास जुट जाती है। पलकों में छुपती ऊँचाइयाँ घिर आती हैं, अनोखे माथे पर अल्हड़ बाल झुक आते हैं और मुट्ठियों में जहान-भर को बाँध लेने के अरमान सिमट आते हैं।

साहबो, हमने निर्मल को एक ऐसी ही सुबह देखा था। चेहरे पर ताज़े ख़ून की चमक थी—माथे पर गिरते बालों में तरन्नुम था और साथ उनकी वही कहानी थी जिसका ज़िक्र हम पहले कर चुके हैं।

ख़ुदा झूठ न बुलवाए, हमने एक सरसरी निगाह डाली थी और निर्मल की सामर्थ्य को दिमाग़ में सोख लिया था। उसी सुबह हम जान गए थे कि ज़रूर निर्मल कुछ ऐसा करने के क़ाबिल हैं जो अभी किसी दूसरे ने नहीं किया।

पेशे-ख़िदमत है निर्मल के लिखने की दास्ताँ। यह न समझ लीजिएगा कि हम निर्मल की ख़ूबियों या ख़ामियों का ब्यौरा देने जा रहे हैं। यह अधिकार तो एकमात्र उनके आलोचकों का है। हम पाठक होने के नाते सिर्फ़ उनकी प्राप्ति पर चर्चा करेंगे।

निर्मल वर्मा के कहने के मुताबिक़ लेखक निर्मल और निर्मल लेखन में कुछ अजीब-सा अपने ही ढंग का अपनापा है। ऐसा कि निर्मल के क़लम उठाते ही दोनों के दरमियान कोई दूरी, कोई दुराव नहीं रहता। सगेपन से दोनों में एक तालमेल बैठता चला जाता है। निर्मल के मिज़ाज में कोई तल्ख़ी नहीं उठती, बस कभी-कभार छोटी-मोटी झुँझलाहट-भर।

हमारे ख़याल में यही निर्मल है और यही है निर्मल की साहित्य-रचना का आन्तरिक बिन्दु भी। बाक़ायदा एक ही तरह की जकड़न, एक ही तरह का ‘इमोशनल-टैम्परेचर’, अपनी अनुभूतियों की ज़ंजीर में एक-दूसरे से गुँथी। न कहीं दुराव, न उत्तेजना। बसन्त के झोंकों की तरह अडोल पत्तों की धीमी झरमराहट बेखटके बेआहट आपके आस-पास घिरने लगती है। आप देखते हैं, महसूसते हैं और आप उदास हो जाते हैं। आपकी आँखों के सामने—पार्क, फल, हरी घास, अन्तहीन आकाश, हवा की सरसराती लय में अचानक बज उठती गिरजे की घण्टियाँ।

ग़लत न होगा यह कहना कि निर्मल की अधिकांश रचनाओं में उनकी अपनी अन्तरंग अनुभूतियों और उनके चरित्रों के स्तर पर गहरा तारतम्य है। लेखक के रूप में जो वह ख़ुद महसूस करते हैं, वही उनके पात्र भी।

हशमत निर्मल को लगातार पढ़ते रहे हैं। एक पाठक की हैसियत से वह कहने में संकोच नहीं करेंगे कि निर्मल अपने पात्रों पर बराबर अपना अंकुश बनाए रखते हैं। कुछ-कुछ इस तरह, जिस तरह गोद से निकले बच्चों को माता-पिता खेल-खेल में ही अपनी ज़बान, अपना सलीक़ा, अपना क़ायदा सिखाते चले जाते हैं। कुछ ऐसा ही निर्मल भी अपने पाठकों के साथ करते हैं। शब्दों के साथ-साथ एक लय, एक तन्मयता, एक जादू, एक गहरी उदासी। इन सब सम्वेदनाओं और अनुभूतियों को चुनने का, पिरोने का अधिकार भी लेखक के पास है, जो पार्क की बैंच पर बैठा है, और अपने आस-पास घटते हुए को ख़ुद पीता है, फिर पाठकों को पिलाता है।

हर लेखक अपने पात्रों का शायद पहले जनक होता है, फिर उनकी आँखें खुलते ही उनकी माँ भी बन जाता है। निर्मल क्या दोनों हैं?—एक साथ माता-पिता? क्या एक ही लेखक दोनों ज़िम्मेदारियाँ निभा सकता है? क्या एक ही लेखक एक में दो हो सकता है? एक साथ अपने पात्रों को काया और आत्मा दे सकता है?

हमें नहीं मालूम निर्मल ने इन दोनों को कैसा निभाया है—हाँ, निर्मल ने अपने पात्रों को, ऋतुओं और मौसमों को, धूप-छाँह को, बरखा-बर्फ़ को, बादलों को, पहाड़ों की चोटी को अन्दर और बाहर की स्मृतियों के ‘अपरचर’ में से उजागर किया है।

एक साथ जो भी क़लम ढेरों धूप, हवाएँ, चाँदनी, रुई-सी बर्फ़, बर्फ़ों के टीले, फूलों के मुखड़े ऐसे आँक सके जैसे निर्मल ने आँके हैं, उन्हें स्वर और संज्ञा दे सके—यक़ीनन वह बड़ी क़लम है।

निर्मल को हम बीते हुए, जिए हुए मीठे बचपन का चितेरा समझते हैं। बचपन की जो क़ीमती पारदर्शियाँ निर्मल ने हमारे साहित्य को दी हैं, वे अनूठी हैं, बेजोड़ हैं। इस बात पर हमें निर्मल से रश्क है।

हम जानते हैं कि ऐसी क़ीमती यादों को संजोनेवाले निर्मल का बचपन ज़रूर गहरे लाड़-चाव और प्यार में गुज़रा होगा। पूछने पर निर्मल ने बताया कि यह सही है। शरारती होने के बावजूद निर्मल के लिए माता-पिता के लाड़ की इन्तहा नहीं थी। उसी ममता-प्यार को बार-बार लौटा लाने को निर्मल अपनी रचनाओं में बचपन के टुकड़े पिरोया करते हैं। हवाओं में, पहाड़ों की पगडण्डियों पर, उदास घरों में, कॉटेज की छतों पर, उतराइयों, चढ़ाइयों और जमी बर्फ़ पर। इस पूरे माहौल में एक बात हशमत को अजीब लगती है कि ये सब बच्चे अकेले-दुकेले होते हुए भी अपने व्यवहार में किसी आभिजात्य के परिष्कृत ताने-बाने से बंधे लगते हैं। अनुभव करने, क्षणों को छू लेने की अनुभूति किसी घने प्रौढ़त्व से फिसलकर बचपन पर झुक जाती है या ‘सी-सॉ’ पर झूलती नज़र आती है।

इसे निर्मल का जादू कहा जा सकता है। यही निर्मल के सृजन का वह बिन्दु भी है जहाँ से निर्मल एक के बाद एक कहानियाँ उठाते चले जाते हैं।

आप भी अगर हमारी तरह निर्मल के लेखक की लगातार बराबर एक-सी दौड़ के साक्षी हैं तो ज़रूर जानते होंगे कि ‘परिन्दे’ से लेकर ‘लाल टीन की छत’ तक निर्मल वर्मा ने अपने अनोखे एकान्त में समाज से, आस-पास फैले विद्रूप से अलग-थलग इसी के साक्षात्कार को निभाया है।

‘लन्दन की एक रात’ जैसी कहानी इसका अपवाद है।

हमें उम्मीद थी निर्मल के लिए यह एक ज़रूरी मोड़ होगा लेकिन ऐसा हुआ नहीं। अगर होता तो वह निर्मल के लेखन को कहीं अधिक वज़न देता।

कुछ लोग अपने लेखन में देर तक एक उम्र के नहीं रहते (न ही रहना चाहिए)। कुछ देर तक छोटे रहते हैं, फिर अचानक बड़े हो जाने का अहसास करवाते हैं। कुछ छोटी आँख से शुरू करते हैं और जल्दी ही क़द निकाल कन्धों को छूने लगते हैं। कुछ चुपचाप अपनी उम्र और लम्बाई के साथ-साथ बड़े होते चलते हैं। अपनी रचनाओं से कुछ इस तरह के सबूत दिए चले जाते हैं कि उम्र की हर इकाई या दहाई उनके हस्ताक्षरों में मौजूद है।

निर्मल का मौसम ऐसा नहीं। अनोखी बात ही समझिएगा कि लगातार जाड़े-गर्मी और बहार की ऋतुओं को आँकते निर्मल अपनी पिछली किताब से अपनी अगली किताब तक चौंकाते नहीं, विभक्त नहीं करते और अनजाने में ही आपसे स्वीकृत होते चले जाते हैं। निर्मल के पाठक हमारी बात से ज़रूर सहमत होंगे।

निर्मल का साहित्य आम आदमी—साधारण दिल-दिमाग़ का साहित्य नहीं है। निर्मल का रचना-संसार ‘सोफ़िस्टीकेटेड’, मानसिक रूप से अति परिष्कृत, वर्ग का साहित्य है। ऐसा कहना निर्मल की रचनात्मक सीमाओं की ओर इशारा करना नहीं है, बल्कि उसकी विशेषताओं का जायज़ा लेना है।

पेश हैं उनकी दो किताबों से दो मुख़्तलिफ़, मगर एक जैसे दो टुकड़े—

“यह हमारे होस्टल की दोपहर थी। सर्दी की दोपहर, जो हर होस्टल में एक जैसी ही होती है—जब क्रिसमस के दिन इतने पास हों। मुझे कुछ भी पता नहीं चला था। मैं सोता रहा था—शायद सारी सुबह उसने मेरे आने की प्रतीक्षा की होगी। एक उम्र में यह विचार ही बहुत रुआँसा लगता है कि कोई ख़ाली-ख़ाली-सा होकर तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा हो। एक संग बहुत सुख-सा भी होता है—बाद में लगता है, तुम सबसे अलग हो। तुम एकदम बड़े हो गए हो। और यह असम्भव-सा लगता है कि जिस घड़ी तुम सो रहे हो, उस घड़ी कोई तुम्हारी बाट जोह रहा हो। तुम्हें अचानक पहली बार अपनी अनिवार्यता का पता चलता है। उस कातर-से डर का… जिसमें पहली बार तुम्हारे माँ-बाप साझा नहीं करते।”

—’वे दिन’

“सूरज मुरझाया-सा निकलता—पेड़ों के ऊपर एक रक्तहीन, पीला गोला। फटी-फटी-सी रोशनी समूचे शहर तक तिरती रहती। सिर्फ़ आकाश के हाशिए चमकीले दिखायी देते और उस चमक से चमकती हुई बर्फ़ दिखायी देती—वही बर्फ़ जो उस रात पहाड़ों पर गिरी थी। उन सर्दियों की पहली बर्फ़। शहर से अलग और ऊपर। लेकिन उसकी छुअन चारों तरफ़ हवा में दिखायी देती। पहले जहाँ इक्के-दुक्के मकानों में आग जलती थी, अब हर मकान की चिमनी से धुआँ उठता दिखायी देता। सफ़ेद धूमिल हवा में समूचा शहर सुलगने-सा लगता—धुएँ, बादल और बर्फ़ में काँपता हुआ।”

—’लाल टीन की छत’

यह है निर्मल की लेखनी का चमत्कार जिसने हिन्दी के गद्य को समकालीन सम्वेदना से जोड़ा है। ऐसे गद्य को कविता कहा जाए तो अतिशयोक्ति न होगी। निर्मल का पूरा मिज़ाज, ‘टेम्परामेण्ट’, कवि-मन का है। वही इण्टेन्सिटी, वही रूमानियत, वही अधखुली आँखों से यथार्थ को अबूर कर डालने की लापरवाही।

विरोधाभास ही समझिए कि मार्क्सवादी विचारधारा से प्रभावित निर्मल के लेखन में रोज़मर्रा की ज़िन्दगी से अलग और दूर पात्र अतिरिक्त सम्वेदनशीलता, परिष्कृत भावुकता से आक्रान्त हैं। वे एक ख़ास मानसिक धरातल पर जीते हैं। वे जैसे एक तरल गहराई में आपको अपने साथ डुबोएँगे। और गोता देकर निकाल लेंगे। और फिर आपकी आँखों के आगे से न सिर्फ़ अपने को, बल्कि आपको भी ओझल कर देंगे। फिर भी आप उनके साथ रहेंगे। क्योंकि निर्मल-साहित्य को पढ़नेवाला पाठक उनकी रचनाओं से दूर रह ही नहीं सकता।

यह उनकी विधा और शिल्प की बहुत बड़ी प्राप्ति है। निर्मल यथार्थ से अलग एक और दूसरी दुनिया बना डालने की सामर्थ्य रखते हैं। अब सुनिए निर्मल लिखते कैसे हैं। लाइनदार काग़ज़, बढ़िया या मामूली लाइनदार कापी भी हो सकती है। लिखावट उनकी ख़ूबसूरत। साफ़-शफ़्फ़ाफ़।

निर्मल की हँसी में ताज़गी है। यह ज़्यादा ताज़ी इसलिए भी लगती है कि निर्मल सोचने के आदी होते हुए भी हँस लेते हैं।

निर्मल अपनी कहानियों, उपन्यासों के अक्सर तीन ड्राफ़्ट करते हैं। पैदायशी जीनियस उनसे सबक सीखे। निर्मल लिखते हैं तो पढ़ते भी ख़ूब हैं। हमने उनकी शेल्फ़ों को देखकर कई नये नाम याद किए। अगली किसी साहित्यिक गोष्ठी में (अगर वहाँ निर्मल मौजूद न हुए तो) धड़ाधड़ हम उन किताबों का नाम लेंगे।

निर्मल के कमरे में ढेरों किताबें हैं। फ़र्श पर उनका बिस्तर है। (नये प्रतिभाशाली लेखक नोट करें और इस तर्ज़ को अपनाएँ।) कोने में छोटी-सी रैक है। चाय-कॉफ़ी, चीनी, कुछ बिस्कुट, चीज़, डबल रोटी और छोटी-सी चौकी पर हॉट-प्लेट। मेहमानों के लिए कुर्सी। एक कोने में पढ़ने की टेबल। दरवाज़े पर ढिलाई से लटकता परदा। कमरे की पूरी बनावट और बुनावट देखकर हमें बहुत अच्छा लगा। कहीं कुछ दिखावटी या चौंकानेवाला नहीं। साधारण सादगी। रहने का सिर्फ़ जुगाड़-भर।

कमरे-भर की सबसे कीमती चीज़ पर हमारी नज़र पड़ी तो हमने निर्मल से आँख नहीं चुरायी।

उठकर देखना चाहा तो निर्मल ने बहत छोटी तस्वीर अपनी बिटिया की हमारे हाथ में थमा दी। जिसके पापा निर्मल वर्मा हों, वह मीठा चेहरा निर्मल के पाठकों के नज़दीक भी क़ीमती है। निर्मल की यह बच्ची इन दिनों लन्दन में है। स्कूल जाती है और अपने पापा को कभी-कभार ख़त लिख दिया करती है। अपने आप में एक कहानी।

निर्मल के इर्द-गिर्द कहानियों का संसार है। ख़ुद कहानियों को तलाश रहती है कि कब निर्मल उन्हें अपने ताने-बाने में गूँथें।

‘लाल टीन की छत’ में दिया गया परिचय कहता है कि निर्मल हिन्दी के उन बिरले साहित्यकारों में हैं जिन्हें लेखन के अलावा संगीत, चित्रकला, स्थापत्य तथा फ़िल्म में भी गहरी दिलचस्पी है।

लिखनेवाले साथियो, ‘वक़्त न गँवाइए’—निर्मल के नक़्शे-क़दम पर चलिए। एक भरपूर बुद्धिजीवी बन जाने के ख़्वाब को सच कर डालिए।

हाँ, निर्मल के लेखन से जुड़ी विदेशी शराबों के बारे में दोस्तों से हमने भी बहत कुछ सुना है लेकिन इतना कह दें कि हमने उनके कमरे में कुछ भी ख़ाली या भरा नहीं देखा।

दुपहर निर्मल के साथ गुज़ार हम नीचे उतरे। दो-चार क़दम आगे उठाए होंगे कि फिर पलट लिए। सोचा निर्मल से यह तो कहते जाएँ कि प्यारे दोस्त, शाम भले कॉन्सर्ट पर जाओ, बीथोविन सुनो, रविशंकर, अली अकबर ख़ाँ—मगर जो तुम्हारी गली में थुथनी उठाए सूअर घूम रहे हैं उन्हें भी तो देखो। कुछ ग़ौर करो। तुम्हारी लाजवाब क़लम से कोई यथार्थ तो उभरे। कोई एक यथार्थ। ज़िन्दगी से ज़िन्दगी तक जुड़ा हुआ।

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कृष्णा सोबती
कृष्णा सोबती (जन्म-१८ फ़रवरी १९२५, गुजरात में) (सम्बद्ध भाग अब पाकिस्तान में) मुख्यतः हिन्दी की आख्यायिका (फिक्शन) लेखिका हैं। उन्हें १९८० में साहित्य अकादमी पुरस्कार तथा १९९६ में साहित्य अकादमी अध्येतावृत्ति से सम्मानित किया गया था। अपनी बेलाग कथात्मक अभिव्यक्ति और सौष्ठवपूर्ण रचनात्मकता के लिए जानी जाती हैं। उन्होंने हिंदी की कथा भाषा को विलक्षण ताज़गी़ दी है। उनके भाषा संस्कार के घनत्व, जीवन्त प्रांजलता और संप्रेषण ने हमारे समय के कई पेचीदा सत्य उजागर किये हैं।