‘Niyati’, a poem by Anamika Sharma

मेरा कोई ठिकाना नहीं
न पिता का घर मेरा रहा
ससुराल तो ससुराल
ही रहा।
जिस घर रही,
किसी और की ही छाप रही…
जब भी अपने दिल से
कोई कोना घर का
अपना मान लेती
अगले ही पल उस पर
क़ाबिज़ कोई और हो लेता।
बड़े जतन से सजाती
घर की छत, देहरी,
छाँटकर लाती सुन्दर परदे
और ग़लीचे,
आँगन बुहार रोज़ पौधों
को मैं सींचती,
तरह-तरह के जतन कर
घर के कोने-कोने को
सँवारती,
पर घर की दीवार में
एक रोशनदान भी
मेरा ना रहा।
वो झालरों से
रोशन करते घरों को
और मैं हर दीवाली
एक-एक दिया हाथों से
रंगती..।
घर के हर कोने को रौशन
करने का जतन
बड़े मन से करती।
आँगन में रंगोली सजाती
देहरी पर दिया जलाती
सबके मंगल की कामना मैं करती।
पर मुझे सिर्फ़ झिड़कियों में
ही जगह मिलती।
मेरी झोली में बस
तानों और उलाहनों का
अम्बार आकर गिरता।
बिमारियों की लगी क़तारों में
चिंता में, मैं घुलती
लगा रंग-बिरंगी
तितलियाँ और तस्वीरें
वास्तु दोषों को दुरुस्त
करने का प्रयत्न मैं करती।
पर अपनों के दिल में
बसे ईर्ष्या-दोष का
उपाय न मैं कर पाती।
तिल-तिल जलती
उपेक्षाओं के गहरे तल
में मैं डूबती
पर मुझे तरने
कोई घनश्याम नहीं आते
स्वयं ही डूबना
स्वयं ही तरना
पर आख़िरी साँस तक भी
वो स्नेह को तरसना
शायद यही है नियति
एक ब्याहता की
फिर चाहे वो हो
एक गृहणी या
अपने पैरों पर
खड़ी आधुनिकाएँ।

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