ओ समय के देवता! इतना बता दो—
यह तुम्हारा व्यंग्य कितने दिन चलेगा?

जब किया, जैसा किया, परिणाम पाया
हो गए बदनाम ऐसा नाम पाया,
मुस्कुराहट के नगर में प्राण ऊबे
आँसुओं के गाँव में आराम पाया,

विविधताओं के जनक! इतना बता दो—
यह तुम्हारा ढंग कितने दिन चलेगा?
ओ समय के देवता…

ढूँढता है रूप, तुम मिलते नहीं हो
गंध रचती छंद, तुम खिलते नहीं हो,
साधनाओं का समर्पण हो रहा है
तुम मगर पाषाण हो, हिलते नहीं हो,

वंचनाओं के वणिक! इतना बता दो—
यह हमारा संग कितने दिन चलेगा?
ओ समय के देवता…

यह पहेली कुछ समझ में आ न पायी
हर कली के साथ काँटों की सगाई,
तुम अकेली धूलि का आशीष ले लो
मैं सितारों से दिला दूँगा बधाई!

सर्जनाओं के रुचिर रूपक! बता दो—
यह तुम्हारा रंग कितने दिन चलेगा?

ओ समय के देवता! इतना बता दो—
यह तुम्हारा व्यंग्य कितने दिन चलेगा?

बलबीर सिंह 'रंग' की ग़ज़ल 'आइए मरुभूमि में उद्यान की चर्चा करें'

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