ओस की बूँदों में घुलकर
एक पेड़ की पत्तियों से
टपक रहे हैं
चाँद,
कुछ तारे
धीरे-धीरे
तुम्हारे होंठों पर।

हल्के हौले कड़क कर
कुछ भीगी
कुछ मुलायम
कुछ शुष्क पत्तियाँ
अपना स्पर्श बाँट रही हैं
थोड़ा आसमान में
थोड़ा तुम्हारे तन पर

तुम बस थोड़ा आगे बढ़ो
अपनी चेतना खो बैठो
और पी जाओ आकाश को
धरा ओ सुहागिन!

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पुष्पेन्द्र पाठक
दिल्ली विश्वविद्यालय में शोधार्थी। Email- [email protected] Mobile- 9971282446

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