यह अक्टूबर फिर से बीतने को है
साल-दर-साल इस महीने के साथ
तुम बीत जाती हो
एक बार पूरा बीतकर भी
फिर वहीं से शुरू हो जाता है सब

मटियल शृंगार करती हुई
हरी दूब पर बिखरी ओस
तलुओं से चिपक जाती है
जैसे प्रकृति लिख रही हो चिट्ठियाँ
तुम्हारी तरफ़ से
जो तुमने नहीं लिखीं कभी

मैं अपनी धूप का एक टुकड़ा बन गया हूँ
जो काग़ज़ों पर बेतरतीब छपता चला गया है
सफ़ेद और काले के सिवा
कोई रंग चढ़ता नहीं है दरीचों पर
यह धूप न इससे आगे आती है
न मैं इसके आगे तलाशता हूँ धूप

कितनी महीन और बिखरी हुई हो तुम
मेरी स्मृतियों में
जिनको चुगते हुए मेरी चोंच से ख़ून आने लगा है
अब यह विरह गान गाने का संताप
मुझे मेरी भौतिकताओं से दूर घसीटता ले जाता है

अक्टूबर आते-आते जिज्ञासा लौट आती है
कि कोई पत्ता हिलेगा और तुम आ जाओगी
कोई ट्रेन रुकेगी और तुम आ जाओगी
कोई सुबह बिखरेगी और तुम आ जाओगी
कोई शाम बीतेगी और तुम आ जाओगी

लेकिन तुम नहीं आती हो
बस अक्टूबर आता है
मुँह लटकाए बैठता है और
एक औंधी सुबह निकल जाता है

एक दिन देखना
ऐसा होगा कि
इस महीने के साथ मैं बीत जाऊँगा
तुम पर सारे अक्टूबरों का उधार चढ़ाए।

आदर्श भूषण की कविता 'ग़ायब लोग'

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