किताब: ‘पालतू बोहेमियन’
लेखक: प्रभात रंजन
प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन

टिप्पणी: देवेश पथ सारिया

पिछले कुछ समय में कथेतर गद्य की किताबों ने पाठकों को प्रभावित किया है। प्रकाशकों के बीच भी इस तरह की पुस्तकों का महत्त्व बढ़ा है। एक पाठक के तौर पर मैं उपन्यासों की अपेक्षा कविता या कहानी संग्रह के अतिरिक्त कथेतर गद्य पढ़ना पसंद करता हूँ।

इस बीच मैंने ‘पालतू बोहेमियन’ पुस्तक किंडल पर पढ़ी।‌ यह एक जीनियस लेखक मनोहर श्याम जोशी के जीवन के बारे में संस्मरणों का गुलदस्ता है। लेखक प्रभात रंजन ने बहुत ईमानदारी से इसे लिखा है और कई जगह अपनी ही धज्जियाँ उड़ायी हैं।

किताब का लेखक एक शोधकर्ता है जो मनोहर श्याम जोशी के लेखन में उत्तर-आधुनिकता पर शोधरत है। बहुत-से हिन्दी लेखक अपने ऊपर पी.एच.डी. या एम.फिल. किया जाना बड़ा सम्मान मानते हैं, कुछ सम्मान से भी बढ़कर एहसान और शोधकर्ता के सामने बिछ जाते हैं। ‘स्पून फ़ीडिंग’ करने की हद तक आ जाते हैं। पर, मनोहर श्याम जोशी एक दूसरी मिट्टी के बने थे। वे शिक्षा तंत्र की कमियों और औपचारिक उपलब्धियों पर तंज़ कसते रहे। यही तंज़ प्रभात रंजन किताब में ख़ुद भी करते हैं। वे विश्वविद्यालयों में व्याप्त शोध प्रणाली और तमाम खानापूर्ति पर व्यंग्य करते हैं। कथेतर गद्य की किताब में यह साफ़गोई और ईमानदारी सबसे महत्त्वपूर्ण अवयव होता है।

इस किताब से आप एक बुद्धिजीवी, मसिजीवी को जान पाते हैं, जो स्वयं को ‘पालतू बोहेमियन’ कहता था। सीखते हैं कि गुड़ के साथ फीकी चाय पीने वाला एक लेखक किस तरह कहानियों और उपन्यासों के प्लॉट शुरू करता था। कैसे उसकी शुरू की गई एक कहानी अपने अंतिम रूप में एक उपन्यास बन जाती है। किस तरह वह किसी टीवी धारावाहिक की कल्पना करता था। कैसे आँकता था कि किसी कहानी में कितने एपिसोड होने की सम्भावना है। धारावाहिक की पृष्ठभूमि की पड़ताल के लिए क्या शोध ज़रूरी है और वह कहाँ जाकर किया जाना है। क्यों एक लेखक को धारावाहिक के पहले ही एपिसोड में सारी ताक़त नहीं झोंक देनी चाहिए!

यहाँ जोशी जी के साहित्यिक सम्बन्धों की भी चर्चा होती है। कृष्ण बलदेव वैद को बेहद अध्ययनशील मानते थे और अज्ञेय को अपना गुरु। वे अज्ञेय की जीवनी भी लिखना चाहते थे और इस विचार को तज देने का उनका कारण भी बड़ा रोचक है।

मनोहर श्याम जोशी बोलकर टाइप करवाते थे। इस हेतु उन्होंने एक टाइपिस्ट रखा हुआ था। यह किताब मनोहर श्याम जोशी के उन दिनों को रेखांकित करती है जब बॉलीवुड के अनेक निर्देशक उन्हें सिर आँखों पर उठाए रखते थे। साथ ही वे टीवी के सितारा लेखक भी थे। ‘हम लोग’ जैसा कालजयी धारावाहिक उन्होंने ही लिखा। बाद में 90 के दशक के उत्तरार्द्ध में निजी चैनलों की आमद के साथ समय बदला और लोगों की रुचि भी बदली। मनोहर श्याम जोशी इस बदलाव के अनुरूप टीवी लेखन की अपनी शैली बदल नहीं पाए। बहरहाल, हम जानते हैं कि अंततोगत्वा टीवी धारावाहिकों का कंटेंट आमतौर पर गुणवत्ता में गिरता ही गया है।

प्रभात जी और उनके साथी देश-विदेश की अनेकानेक पुस्तकें पढ़ते हैं, जिनका नाम किताब में है। मनोहर श्याम जोशी भी उन्हें कई पुस्तकों का रेफ़रेंस देते हैं (सिर्फ़ शोध के लिए नहीं, अन्यथा भी)। इन सभी किताबों को पढ़ लिया जाए तो लेखन की मज़बूत नींव तैयार हो सकती है। प्रभात रंजन लाइब्रेरी खंगालते हैं। मनोहर श्याम जोशी के लाइब्रेरी कार्ड का भी इस्तेमाल करते हैं। यह पुस्तक पढ़कर एहसास होता है कि लगभग दो-ढाई दशक में हम कहाँ आ गए हैं। लाइब्रेरियाँ अब सूनी रहने लगी हैं। ताइवान में मेरी अपनी यूनिवर्सिटी में एकाधिक समृद्ध लाइब्रेरी हैं और वहाँ कोई जाता भी है तो लैपटॉप पर शांति से बैठकर अपना काम करने। सूचना क्रांति में जहाँ हमें अध्ययन के लिए उपलब्ध विकल्पों का लाभ उठाना चाहिए था, वहीं हम खेल खेलने, क्रिकेट का स्कोर देखने, शॉपिंग करने और दूसरी चीज़ों में व्यस्त हो गए और पढ़ने की आदत में क्षरण होता गया। यह एक सुकून की बात कही जा सकती है कि ऑनलाइन जितने पढ़ने के विकल्प हैं, उनकी ओर आकर्षण धीरे-धीरे ही सही, बढ़ रहा है।

इस किताब के माध्यम से ही मुझे जानकारी हुई कि प्रभात जी की वेबसाइट जानकीपुल को उसका नाम दरअसल उनकी एक पुरस्कृत कहानी से मिला। यह कहानी संस्मरणात्मक शैली में थी। मनोहर श्याम जोशी जी ने ठीक ही चीन्ह लिया था कि प्रभात जी एक अच्छे संस्मरणकार हो सकते हैं।

पुस्तक में से कुछ पंक्तियाँ जो कि मनोहर श्याम जोशी जी ने प्रभात जी से कहीं और सम्भवतः आज भी लेखकों के लिए उपयोगी साबित होंगी—

“याद रखो, कितना भी अच्छा लिख लोगे, कितने भी बड़े प्रकाशक के यहाँ से किताब आ जाएगी लेकिन उससे कोई आय हो जाए, ऐसा नहीं है। हिन्दी लेखक को सम्मान से अधिक कुछ नहीं मिलता। इस तरह से करोगे तो वह भी जाता रहेगा।”

इस पुस्तक का प्रवाह लाजवाब है और प्रभाव दीर्घजीवी। मेरी दृष्टि में यह कथेतर गद्य की नायाब किताब है।

'देस: देशज सन्दर्भों का आख्यान'

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देवेश पथ सारिया
प्राथमिक तौर पर कवि। गद्य लेखन में भी सक्रियता।पुस्तकें: 'हक़ीक़त के बीच दरार' (2021, वरिष्ठ ताइवानी कवि ली मिन-युंग के कविता संग्रह का मेरे द्वारा किया गया हिंदी अनुवाद) प्रथम कविता संकलन एवं ताइवान के अनुभवों पर आधारित गद्य की पुस्तक शीघ्र प्रकाश्य।अन्य भाषाओं में प्रकाशन: मेरी कविताओं का अनुवाद अंग्रेज़ी, मंदारिन चायनीज़, रूसी, स्पेनिश, पंजाबी, बांग्ला, और राजस्थानी भाषा-बोलियों में हो चुका है। मेरी रचनाओं के ये अनुवाद यूनाइटेड डेली न्यूज़, लिबर्टी टाइम्स, लिटरेरी ताइवान आदि पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं।साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशन: हंस, नया ज्ञानोदय, वागर्थ, कथादेश, कथाक्रम, परिकथा, पाखी, आजकल, बनास जन, मधुमती, कादंबिनी, समयांतर, समावर्तन, जनपथ, नया पथ, कथा, साखी, अकार, आधारशिला, बया, उद्भावना, दोआबा, बहुमत, परिंदे, प्रगतिशील वसुधा, शुक्रवार साहित्यिक वार्षिकी, कविता बिहान, साहित्य अमृत, शिवना साहित्यिकी, गाँव के लोग, कृति ओर, ककसाड़, अक्षर पर्व, निकट, मंतव्य, गगनांचल, मुक्तांचल, उदिता, उम्मीद, विश्वगाथा, रेतपथ, अनुगूँज, प्राची, कला समय, प्रेरणा अंशु, पुष्पगंधा आदि ।समाचार पत्रों में प्रकाशन: राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर, प्रभात ख़बर, दि सन्डे पोस्ट।वेब प्रकाशन: सदानीरा, जानकीपुल, पोषम पा, लल्लनटॉप, हिन्दीनेस्ट, हिंदवी, कविता कोश, इंद्रधनुष, अनुनाद, बिजूका, पहली बार, समकालीन जनमत, मीमांसा, शब्दांकन, अविसद, कारवां, हमारा मोर्चा, साहित्यिकी, द साहित्यग्राम, लिटरेचर पॉइंट, अथाई, हिन्दीनामा।सम्मान: प्रभाकर प्रकाशन, दिल्ली द्वारा आयोजित लघुकथा प्रतियोगिता में प्रथम स्थान (2021)संप्रति ताइवान में पोस्ट डाॅक्टरल शोधार्थी। मूल रूप से राजस्थान के राजगढ़ (अलवर) से संबंध।

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