प्रेम की परिपूर्णता
है इसी में,
परोपकार को भी इसमें मिलाया जाए,
बिना इस सहज, सरल भाव के
प्रेम को स्वार्थ में बदलते देर नहीं लगती।
प्रेम ही मूल तत्व है ब्रह्माण्ड का
समाहित है इसके कण-कण में,
अनुराग बसा है इसके हर अंश में,
उदीप्त होती है ये निहारकर
हर विकल, हर दुखी को।
प्रेम की अक्षुण्णता इसी में है कि
इसे वृहदतम स्तर पर ले जाया जाए,
मैं और मेरा
को छोड़कर
हर जीव को उसके रूप में अपनाया जाए
और हर व्यथित व्यक्ति में भी कोई अपना सा दिख जाए।
अपने लिए ही जीते जाना,
सात पीढ़ी तक धन की व्यवस्था की ज़िम्मेदारी ढोना,
कहीं भी एक कोना रह न जाये स्व की महक से परे
ऐसा किसी हाल में हो न पाए।
पोसते रहना अपना शरीर,
और
बच्चों को अपने
ज़रा सी तकलीफ छू ना जाये,

ये विशेषता तो जानवर में भी
भरपूर पाई जाती है।
पर वह इंसान क्या है सच में इंसान
दूसरे का दुख देखकर भी, आँखें उसकी रीती रह जाएं।
प्रेम क्या इतना छोटा शब्द है?
प्रेम का सत्य रूप,
उसका उत्कृष्ट स्वरूप है
निश्चय ही
करूणा है
ममता है
और निश्छल अनुराग, स्नेह
किसी का किसी के प्रति,
लिप्सा, कामना और वासना के बादलों से दूर
झरता है ऐसा निर्झर प्रेम का
जिसमें नहाकर
व्यथित मन की सारी व्याकुलता
समा जाती है
शांति की गोद में।
ऐसा निश्छल भाव
ऐसा मन,
किसी विशाल सागर में छिपी हुई सीपी बन जाता है,
सबसे विलग,
सबसे विशुद्ध।