परती ज़मीन

‘Parti Zameen’, a story by Boya Jangaiah
अनुवाद – डॉ. सना

छह-सात सौ घरों के उस गाँव में ज़्यादातर लोगों की ज़िन्दगी मेहनत-मज़दूरी पर निर्भर है। कई बरस पहले निज़ाम शासकों के राज्य का अन्त होने के बावजूद, उनके प्रतिनिधि रामरेड्डी पटेल और मालिक रंगाराव अब भी ज़िन्दा हैं।

बहुत बड़ा मन्दिर बना सकनेवाले इन भलेमानसों ने पाठशाला के निर्माण में दिलचस्पी नहीं ली, इसी से उस गाँव में हाई-स्कूल भी नहीं बन पाया। इसीलिए उस गाँव के लड़के सातवीं कक्षा से ऊपर नहीं पढ़ पाते। रामरेड्डी पटेल और मालिक रंगाराव जी के बच्चे तो शहर में पढ़ाई करते हैं।

आम रास्ते से गाँव में जाने के लिए अच्छी सड़क नहीं है। बस नहीं आती। कच्चे रास्ते के ठीक न होने के कारण सरकारी अफ़सरान उस गाँव में आते ही नहीं।

सरकार ‘बचत ज़मीन’ को बाँटना चाहती है। उस गाँव में सड़क से सटी तीस एकड़ की परती ज़मीन है। सड़क की दूसरी ओर उजड़ा हुआ मन्दिर और चारों ओर ताड़ के पेड़ हैं। गाँव के हरिजन कहते हैं- “उस परती ज़मीन को जोतेंगे।”

पर मालिक रंगाराव, पटेल रामरेड्डी और दूसरे ज़मींदार कहते हैं, “भई! यह तो मुमकिन नहीं!”

“वोटों के लिए.. वर्ना उन्हें क्यों देनी चाहिए?”

पटेल ने कहा, “ज़मीन देंगे, तो क्या वे वोट देंगे! ये पागलपन नहीं तो और क्या है? उस दिन ताड़ी और शराब के लिए जो पैसे देगा, उसे ही..!”

रंगाराव बोला, “तो भी सीने जैसी इस ज़मीन को उन्हें देने का मतलब? इसके बदले कोई खारी ज़मीन दे दें तो चल जाएगा।”

रामरेड्डी पटेल ने सुझाव दिया, “न खारी ज़मीन है, न श्मशान है। दरअसल ज़मीन उन्हें किसलिए चाहिए? जन्तु-जानवर तो वे रखते नहीं, कामचोर कहीं के! वे, क्या उपजाकर मरेंगे। अगर सरकार ज़मीन दे भी देगी तो वे उसे कितने दिन रख पाएँगे? किसी लोट-घाट, बीमारी या शादी के लिए न भी हो तो पीने-पाने के लिए क्या वे ज़मीन गिरवी नहीं रख देंगे? और तो और उसके बाद ली हुई रक़म न चुका सकने पर, वे उसे हमारे ही सिर पर मढ़ देने से नहीं चूकेंगे।”

हरिजन परती ज़मीन के पेड़ काट रहे हैं, यह सूचना मिलने पर ये शरीफ़ लोग उस कटाई को रोकने आए हैं। उनके पीछे उस गाँव का कारिन्दा मादन्ना गाँव की हर जाति के लोगों को ले आया है।

“बचत ज़मीन को भूमिहीन ग़रीबों में बाँटना है! यही न सरकार ने घोषणा की! ग़रीब तो सभी जातियों में हैं। फिर उनका क्या होगा? उन्हें भी तो ज़मीन चाहिए।” रामरेड्डी पटेल कहने लगा।

पटवारी ने अचानक रुककर रामरेड्डी का हाथ पकड़कर खींचा और कहा, “यह बात वहाँ उन लोगों के सामने मत कहना। वर्ना वे भी बैठ जाएँगे कि उन्हें भी ज़मीन चाहिए।”

“सबको थोड़ी-थोड़ी ज़मीन दिला देंगे तो कल पंचायत के चुनाव में वो मुझे ज़रूर वोट देंगे।”

रामरेड्डी ने कहा, “तेरे वोट की ऐसी-की-तैसी! तुझे कितने वोट चाहिए, मुझ पर छोड़ दे, मैं देख लूँगा। यह ज़मीन किसी और के हवाले न हो जाए, पहले इस बात पर ध्यान दे। ज़मीन सड़क से सटी है, आगे-आगे इसकी क़ीमत बढ़ती जाएगी। कल अपने बच्चों को अगर कोई नौकरी न मिले तो कोई इंडस्ट्री, अन्त में एक मुर्गी-फ़ार्म तो खोल सकते हैं या कुछ दिन रुककर प्लॉट्स बनाकर बेचेंगे तो पैसा-ही-पैसा है।” पटवारी अपनी योजना को बताए बिना नहीं रह सका।

“सुनो रामरेड्डी! चुनाव में तुम्हें जितवाने की ज़िम्मेदारी मेरी। इस मामले में मेरी बात पर ‘हाँ’ तो कह! मैं सब देख लूँगा।”

“चलो ठीक है।” कहते हुए दोनों परती ज़मीन की ओर निकल पड़े।

तब तक हर घर से एक के हिसाब से लगभग साठ हरिजन पेड़ काट रहे थे। उनके बच्चे, उनके बुज़ुर्ग सारे कूड़े को एक जगह पर जमा कर रहे थे। उनकी औरतें टोकरियों में खाना ले आई थीं और उन टोकरियों को मेंड़ पर रखकर कूड़े के ढेरों को जला रही थीं।

पटवारी ओर रामरेड्डी, दोनों के मेंड़ पर पहुंचने से पहले ही, कारिन्दा गाँव के सारे लोगों को ले आया। अब लोग मेंड़ पर खड़े हो गए। तब तक कूड़े को इकट्ठा कर रहे बूढ़े लोगों ने सिर से अंगोछा खोला और हाथ जोड़ते हुए झुककर पटवारी और रामरेड्डी को प्रणाम किया।

“क्यों रे पापियों! किससे पूछकर इस ज़मीन के पेड़ काट रहे हो!”

“हमारो गोपाल – वही राजि का बेटा शहर में हॉस्टल में पढ़ाई कर रहा है। सुना है, वह तहसीलदार साहब से पूछ आया है!” सब लोगों में बड़ी उम्र का मल्लया हिचकिचाता हुआ बोला।

“जोतने के लिए रामरेड्डी पटेल बोला और तुम जोतने लगे! क्या तहसीलदार ने पट्टा दे दिया है? पहले सबका काम रुकवा! उन्हें यहाँ आने को बोल!”

“ठीक है मालिक! अरे ओ लिंगय्या, रंगय्या, लच्चय्या – उनसे बोल काम रोक दें। सब लोग यहाँ आओ, मालिक कुछ कहना चाहते हैं।” मल्लय्या ने सबको बुलाया।

सबके आने के बाद, पटवारी ने पूछा, “कहाँ है राजि का बेटा?”

“वो समिति-प्रेसिडेंट से मिलने गया है, अभी तक लौटा नहीं।” मल्लय्या ने कहा।

“वो प्रेसिडेंट तुम्हें क्या, इस गाँव को भी बेच देगा। वो तुम्हारा क्या भला कर सकेगा रे? कामचोर कहीं के। कल चुनाव आनेवाले हैं, बस – उसने एक चाल चली।” रंगाराव मालिक ने कहा।

“तो भी, पीढ़ियों से इस परती ज़मीन पर कभी भी हल नहीं चलाया गया। आज तुम लोगों ने कछौटा मारा रे इसे जोतने के लिए!” दाहिने हाथ से धोती का किनारा पकड़कर बाएँ हाथ से उन्हें ज़मीन को दिखाते हुए मज़ाक के अन्दाज में मालिक रंगाराव कह रहे थे।

“मन्त्रियों के आने पर कुछ बातें किया करते हैं। अपने लोग उन लोगों की पूँछ पकड़कर गोदावरी तर जाने की बात करते हैं।” रामरेड्डी पटेल ने कहा।

“बोलते क्यों नहीं रे! इन लोगों का इस ज़मीन को जोतना, क्या तुम्हारे गाँव के सारे लोगों को पसंद है?” सबको डाँटते हुए पटवारी ने प्रश्न किया।

सिर पर धरे कम्बल को बग़ल में ठूसकर, लम्बी लकड़ी का सहारा लेकर, “भेड़-बकरियों के इधर-उधर चराकर आने के बाद खड़े होने के लिए थोड़ी-सी जगह चाहिए, गाँव के पास की इस थोड़ी सी ज़मीन को तुम लोग जोत लोगे तो कैसे चलेगा, फिर हमारा क्या होगा।”

गाँव के बड़े ग्वाले वीरप्पा ने पूछा।

“हाँ-हाँ- यह सच है। दिन भर चलकर शाम के वक़्त थोड़ी देर खड़े रहने के लिए पशुओं को जगह भी न मिले तो कैसे चलेगा?” किसानों ने कहा।

धोबी ने सौध के लिए, कुम्हार ने मिट्टी के लिए कहा, “गाँव है, तो थोड़ी-सी ख़ाली जगह भी होनी चाहिए।”

तभी गाँव का पुजारी भी वहाँ आया और बोला, “अब कितने दिनों तक मन्दिर भी इसी तरह उजड़ा रहेगा। क्या उसका उद्धार नहीं होगा? भगवान के नाम पर इस ज़मीन का पट्टा करवा दिया जाए, तो भलेमानस खेती करेंगे और गाँव की प्रजा की ओर से मन्दिर में पूजा-पाठ किया जा सकता है। इस बात पर भी ज़रा विचार कीजिए।” कहता हुआ सुँघनी का एक कश लगाकर सुँघनी लगी उँगलियों को अंगोछे से पोंछ डाला।

सब कुछ सुन चुके पटवारी और रामरेड्डी पटेल ने कानाफूसी के बाद कहा, “कुछ भी हो, पुजारी ने जो कहा, वह सुनने लायक़ है। हम सबको ज़रूरी इन्तज़ाम करना भी है, तुम लोगों का क्या ख़याल है?” सबकी ओर देखते हुए।

“भला हम क्यों नहीं मानेंगे? मन्दिर में पूजा-पाठ के लिए मना क्यों करेंगे?”

हरिजनों के सिवा, बाक़ी सब जातियों के लोगों ने ‘हाँ’ भर दी और वे वहाँ से चले गए। जातेजाते हरिजनों से बार-बार यह कहा कि वे उस परती ज़मीन को न जोतें।

हरिजनों को कुछ नहीं सूझ रहा था कि क्या किया जाए, जलते कूड़े के ढेरों को, उन ढेरों में कूड़ा डालते छोकरों को देखते रह गए।

हरिजनों ने परती ज़मीन को जोत डाला।

जोतते समय कूढ़ से भगवान की एक मूर्ति निकल आई। उस मूर्ति के पास हाल ही में भरती हुए (ईश्वर-प्रेम में तल्लीनता की अवस्था में झूलती हुई) एक औरत भविष्यवाणी कर रही थी। उसके चारों ओर लोग खड़े थे।

“ये ज़मीन भगवान की है, इसलिए पीढ़ियों से कोई भी इस पर कब्ज़ा नहीं कर सका। अगर कोई ऐसी कोशिश करेगा, तो अंजाम बुरा होगा।” औरत ने कहा।

मालिक रंगाराव ने गाँव भर में इन बातों का ढिंढोरा पिटवाया। तरह-तरह की बातों के बीच, रहस्यमय संदेहों के बीच, वह दिन बीत गया।

आधी रात गुज़र जाने के बाद हरिजनों की बस्ती में आग लग गई। टोकरों और छोटे बच्चों को गोद में उठाए, बूढ़ों के साथ पकड़े वे झोंपड़ियों से बाहर निकल आए। अपने सर्वस्व का आग में जलते देख सब रो रहे थे।

सारी झोंपड़ियाँ घास-फूस की थीं। सारे लोग नींद से उठकर ‘रस्सी-डोल’ आदि कर ही रहे थे कि इस बीच आग लपक गई।

लाख कोशिशों के बाद भी आग पर क़ाबू नहीं पाया जा सका। मुर्गिया, बकरियाँ वगैरह उनकी सारी सम्पत्ति पल भर में जलकर राख हो गई। गाँव के सारे लोगों ने आग को बुझाने की बहुत कोशिश की, पर बुझा नहीं पाए। हरिजनों की बस्ती पूरी तरह से जल गई।

मालिक रंगाराव और रामरेड्डी पटेल कर्म-सिद्धान्त की व्याख्या सुना रहे थे- “पुजारी के कहने पर भी भगवान की ज़मीन को, देव की मूर्ति को कूढ़ से हिला देने से हरिजनों की बस्ती जल गई।”

तब मालिक रंगाराव ने ‘हाँ’ कहकर अपनी भी सम्पति दे दी।

“कल की भविष्यवाणी सच निकली!” रामरेड्डी पटेल ने भी ‘हां’ भर दी।

“नहीं – सब झूठ है।” गोपालम् के अचानक चिल्ला उठने पर सब लोग उसकी नज़रों और उसकी उठी तर्जनी की ओर देख रहे थे।

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