पर्वत के उस पार
कहीं लो बुझी दीपशिखा
इस पार हुआ धूसर नभ
उतरे पंछी कुछ अजनबी
नौका डूबी…

उस पार मगर वो पेड़
ताकता रहा मौन
मृदु-मन्द सुरीली गुहार
देता रहा कोई पीछे से
उतरी नयनों की गहराई
में सुन्दर हरियाली
लम्बी होती रही बौने तरु की
परछाईं अकेली
विगलित पोर उँगलियों के
बंसी टटोलते रहे रात भर
तारे सिसकते रहे
हुआ घाट निर्जन
धीरे-धीरे…

कोई किसी को भुलाता रहा
पत्ते सड़ते रहे सालों
ढहती रहीं राहें
पाने, न पाने की कशमकश में
कम्पित दो अधर, और
रुका-रुका समय
उभरते रहे तन पर शहर के
चिह्न नये-नये क्रोध के
बिखरती रहीं अन्धेरे में
जटाएँ संन्यासी की

मरघट में कुकुरमुत्ता
पनपते रहे, रेल चीख़ती रही
विवस्त्रा मुझे घेरे पड़ी रही
भूखी धरती धुँधलायी
वर्षा होती रही अनवरत
वर्षा होती रही अनवरत।

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