कुछ बातें देर तक गूँजती हैं
बिना पहाड़ और दीवार से टकराए

शोर में वे
चुपके-से अपनी जगह बना लेती हैं और
बच जाती हैं हमेशा के लिए

बहुत से खरपतवार के बीच
ऐसे ही पलता है
कोई अंजान मगर ज़रूरी पौधा
किसी फूल के लिए
किसी दाने के लिए
किसी छाया के लिए

हमें जिसकी प्रतीक्षा थी
वह ऐसे ही
एक-एक क़दम बढ़ाकर
पहुँचा है हमारे पास
धीरे-धीरे

कोई कंधा मैं खोज रहा था
अपना सिर टिकाने के लिए
तब हिसाब लगा रहा था कि
मैंने किसी को
धकेल तो नहीं दिया आधी नींद में
अपने कंधे से

यही होता है हर बार कि
अगर मैं स्वप्न देखता हूँ तो
सोचता हूँ कि
वे भी मेरे पसीने की गन्ध से भरे हुए होंं।

Previous articleहम माँ के बनाए मिट्टी के खिलौने थे
Next articleचाय-चक्रम्
शंकरानंद
शंकरानंद जन्म 8 अक्टूबर 1983 नया ज्ञानोदय,वागर्थ,हंस,परिकथा,पक्षधर, आलोचना,वाक,समकालीन भारतीय साहित्य,इन्द्रप्रस्थ भारती,साक्षात्कार, नया पथ,उद्भावन,वसुधा,कथन,कादंबिनी, जनसत्ता,अहा जिंदगी, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर,हरिभूमि,प्रभात खबर आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं प्रकाशित। कुछ में कहानियां भी। अब तक तीन कविता संग्रह'दूसरे दिन के लिए','पदचाप के साथ' और 'इनकार की भाषा' प्रकाशित। कविता के लिए विद्यापति पुरस्कार और राजस्थान पत्रिका का सृजनात्मक साहित्य पुरस्कार। कुछ भारतीय भाषाओं में अनुवाद भी। संप्रति-लेखन के साथ अध्यापन। संपर्क[email protected]