चलते-चलते रुक जाओगे किसी दिन,
पथिक हो तुम,
थकना तुम्हारे न धर्म में है
ना ही कर्म में,
उस दिन तिमिर जो अस्तित्व को
अपनी परिमिति में घेरने लगेगा,
छटपटाने लगोगे,
खोजना चाहोगे,
लेकिन धुंध रास्ता नहीं देगी,
एक पग रखते गिरने लगो
उस पल,
उस क्षण,
तुम्हारी बटोरी हुई उपमाएँ साहस भरेंगी,
और स्वाभिमान से लिपटा हुआ,
तुम्हारा प्रतिबिम्ब,
बिना किसी प्रकाश के
ध्वजवाहक बनेगा,
और गौरव गाथा लिखी जाएगी
तुम्हारे संघर्ष की,
घबराना मत,
अगर कोई पाठक न मिले!
क्योंकि,
अश्वमेध के अश्व के सामान,
दौड़ता तुम्हारा मन,
विजयी होगा,
जहाँ भी दौड़ेगा।
इस युद्ध के अकेले योद्धा तुम ही हो,
और तुम्हारा युद्ध भी तुमसे ही है,
विजयी होकर भी,
एक पक्ष हार जाएगा,
और
तुम्हारे अंदर के वन का,
दावानल,
तुम्हें उस दशांश क्षण तक जलाएगा,
जब तक अपने पुनर्निर्माण की प्रक्रिया,
तुम पूरी न कर लो।

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आदर्श भूषण
आदर्श भूषण दिल्ली यूनिवर्सिटी से गणित से एम. एस. सी. कर रहे हैं। कविताएँ लिखते हैं और हिन्दी भाषा पर उनकी अच्छी पकड़ है।

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