पत्थर की ज़ुबान

‘Patthar Ki Zubaan’, Hindi Kavita by Ashok Singh Ashk

ऐ पत्थरों…!
पहाड़ से तोड़कर अलग किये गए पत्थरों,
मैं तुम्हारे दर्द को महसूस कर सकता हूँ।
मुझे पता है
अपनों से अलगाव का दुःख
अपनों को खोने का दर्द।

अब जब तुम अलग हो गए पहाड़ से,
तो ख़ुद को गुमराह न करना
भटक मत जाना, बदले की भावना से।
कभी ख़ुद को इतना मत टूटने देना कि
लोगों के हाथ जाकर किसी पर बरसाए जाओ।

अगर तुम तराशे गए
तो बनना ऐसी मूरत
जिसके सामने तुमको तोड़ने वाला
हाथ फैलाकर याचना करे।

तुम बनना ऐसी नींव के पत्थर
जिसमें खड़ी हो बहु-मंज़िला इमारतें
और रह रहे हों अनेकों मुस्कुराते हुए रंगीन परिवार।

या तुम बनना ऐसे रास्ते के मील के पत्थर
जिसे देखकर लोग अपनी मंज़िल की दूरी पढ़ सकें।

या तुम बनना ऐसी तन्हा बेंच
जिसपर प्रेमी हाथों में हाथ डालकर बैठ सकें
और गुनगुनाएँ प्रेम का एक पहाड़ी गीत।

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