एक अजीब-सा सपना रोज़ देखता हूँ
मेरे पास है चिकने पन्नों वाली डायरी
साथ हैं बेहद सलीक़े से तराशी हुई चन्द पेंसिलें
जिनमें से आती कच्ची लकड़ी की गन्ध,
पेन्सिलों के पृष्ठ भाग में नत्थी है एक रबर
वक़्त द्वारा खींची गयी हर फ़ालतू लकीर को
आराम से मिटाते चलने के लिए

ऐसी पेंसिलें अब चलन में नहीं
जिनका ग्रेफाइट टूटकर काग़ज़ पर बार-बार बिखरता हो
पेंसिल का खुदरा दुकानदार बताता है,
पूछना चाहता हूँ— क्यों?
क्या अब कोई कहीं कुछ ग़लत नहीं लिखता
कि उसे दुरुस्त कर लिया जाए?

चाह कर भी कुछ न पूछ पाता
चुपचाप उचककर साइकिल पर हुआ सवार
चला गया शहर के उस कुख्यात चायघर की ओर
जहाँ लोग निरन्तर चाय पीते
क्रान्ति का अमूर्त रोडमैप बनाते
एक-दूसरे को दिखाते-रिझाते
लोटपोट हुए जाते हैं,
वहाँ हरदम सघन सफ़ेद धुआँ
और अदृश्य कोलाहल भरा रहता है

कहने को तो हमारे समय की पेंसिलें बहुरंगी हैं
पर इनसे हरे-भरे पेड़, नाचता हुआ मोर
कलकल करता नीला चमकीला जल या
सुरख़ाब के पर कोई नहीं रंगता,
इनसे अब कोई नहीं सजाता स्वप्निल ड्योढ़ी

बेतरतीब काली भूरी बैंगनी आकृतियाँ
हमारे वक़्त का सम्भावित मुकद्दर हैं,
उदास पन्नों के बीचोंबीच फँसी नुकीली पेंसिलें
जब तब बरछी बन कलेजे में गहरे तक धँस जाती हैं…

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निर्मल गुप्त
बंगाल में जन्म ,रहना सहना उत्तर प्रदेश के मेरठ में . व्यंग्य लेखन भी .अब तक कविता की दो किताबें -मैं ज़रा जल्दी में हूँ और वक्त का अजायबघर छप चुकी हैं . दो व्यंग्य लेखों के संकलन इस बहुरुपिया समय में तथा हैंगर में टंगा एंगर प्रकाशित. कुछ कहानियों और कविताओं का अंग्रेजी तथा अन्य भाषाओं में अनुवाद . सम्पर्क : [email protected]

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