समाज में टैबू समझे जाने वाले विषयों पर लिखी गई कविताएँ और कहानियाँ अक्सर उससे जुड़ी असजहता से बाहर नहीं निकल पातीं और जाने-अनजाने एक टैबू को तोड़ने के प्रयास में दूसरी असहजता को पोषण दे देती हैं। ऐसे में ऋषभ प्रतिपक्ष के कहानी संग्रह ‘क्रिक पांडा पों पों पों’ से यह कहानी ‘पीरियड का पहला दिन’ पीरियड्स से जुड़ी पुरुषों की असहजता को कठोर क़दमों की माँगों या तीखी बहस-मुबाहसा से दूर नहीं करती, बल्कि उसे शुरू से अंत तक नॉर्मलाइज़ करने का प्रयास करती है। ज़रूर पढ़ें!

ऋषभ प्रतिपक्ष की किताब ‘क्रिक पांडा पों पों पों’ से

“यार, मैं इसके लिए तैयार नहीं थी। एकदम से पीरियड्स आ गए।” नीलेश्मा ने सुबह-सुबह पाँच बजे ही कुनमुनाते हुए कहा।

“अमूमन चार-पाँच दिन पहले आइडिया हो जाता है कि आ रहे हैं पीरियड। इस बार संसद सत्र की वजह से इतना उलझी रही कि ख़याल ही नहीं आया। मंत्रालय वाले हर प्रश्न का जवाब हमीं पर टाल देते हैं, एक हफ़्ते से दिमाग़ इसी में लगा था।”

“अगर याद रहता कि पीरियड्स आनेवाले हैं तो मेरी बॉडी अभी तक तैयार हो जाती।” हर बीतते मिनट के साथ नीलेश्मा की आवाज़ की तल्ख़ी बढ़ती जा रही थी।

कई बार ‘पीरियड’ सुनकर मुरलीधर की आँख तुरंत खुल गईं और वो एकदम रोमांटिक मोड में नीलेश्मा का माथा सहलाने लगा— “मेरी बेटू, कोई बात नहीं। अभी गर्म पानी देता हूँ। चाय बना देता हूँ। बढ़िया-सा नाश्ता करके दवाई खा लो।”

नीलेश्मा उसकी छाती में घुस गई— “बिना बताए पीरियड्स हो जाते हैं तो बहुत दर्द होता है। पेट में अजीब-सी मरोड़ उठ रही है आधे घंटे से। तुम्हारे उठने से पहले ही पैड लगा के आयी। पहले तो चुपचाप पड़ी रही, पर इतनी मरोड़ उठी कि रहा नहीं गया।”

तीन वर्षों की शादी के बाद मुरलीधर को पहली बार पता लगा था कि ‘बिना बताए’ पीरियड्स आ जाने पर इतना दर्द होने लगता है। इसके पहले उसे ये पता चला था कि ज़्यादा स्ट्रेस की वजह से या तो पीरियड बहुत लेट आने लगते हैं या फिर हर दस-पंद्रह दिन में भी आते हैं। जब नीलेश्मा को हर दस-पंद्रह दिन में पीरियड आने लगे थे तो मुरलीधर बड़ा परेशान हुआ था। डर गया कि ये कौन-सी बीमारी हो गई है। इतना ख़ून! कैसे चलेगी ज़िन्दगी?

साढ़े पाँच बज गए। मुरलीधर फ़ोन में घुसा हुआ था। एक हाथ से नीलेश्मा का माथा और पीठ सहलाते और दूसरे हाथ से ट्विटर पर स्क्रॉल करते हुए। अचानक नीलेश्मा चिहुँकी— “अरे यार, पेट क्यों दबा रहे हो? ऑलरेडी दर्द हो रहा है।”

आवाज़ की कड़वाहट से मुरलीधर को समस्या का अंदाज़ा हो गया। अभी तक उसे लग रहा था कि हमेशा की तरह दर्द आकर चला जाएगा। मुरलीधर ने देर नहीं की और फटाफट चाय बनाने चला गया।

“कौन-सा गाना चला दूँ?”

“कोई भी चला दो यार, कोई अच्छा-सा।”

मुरलीधर ने केतली में दूध डाल आँच कम की और स्पीकर लगाकर किशोर कुमार का गाना चला दिया। धीमी आवाज़ में। फिर खिड़की की तरफ़ देखने का अभिनय करते हुए बोला— “मौसम सही लग रहा है। प्रदूषण कम है। हवा साफ़ लग रही है।” फिर उसे एहसास हुआ कि अभी ज़्यादा लाइट आयी नहीं है बाहर, इतना बोलना उचित नहीं है।

चाय उबल गई थी और मुरलीधर ने कप साफ़ कर लिए थे। आज इतवार का दिन था और मेड की छुट्टी थी। मुरली ने फटाफट दिमाग़ में प्लान बनाना शुरू किया कि आज क्या-क्या करना है। पिछले दो सप्ताह के कपड़े साफ़ करने हैं, सारी चड्ढियाँ और बनियान-मोज़े भी। फिर जूते साफ़ नहीं करूँगा, बस पोंछ-पाछकर रख दूँगा। वॉशिंग मशीन में कपड़े पड़े भी हुए हैं परसों के। इन्हें भी सुखाना है। नाश्ता और लंच भी बनाना होगा। आज दो आर्टिकल भी करके भेजने हैं। फ़्रीलांसिंग का पैसा वीकेंड पर ही ज़्यादा मिलता है। दो आर्टिकल तो कमिट कर चुका हूँ।

“कहाँ खोए हुए हो? तब से चाय लेकर बैठे हो। न पी रहे हो, न पीने के लिए कह रहे हो। मैंने बस ये बता दिया कि पेट दर्द हो रहा है, तब से तुम्हारी हवाइयाँ उड़ गई हैं। पता नहीं तुम क्या सोचते रहते हो!” नीलेश्मा ने कप टरका दिया।

मुरली ने तुरंत कप नीलेश्मा के हाथ में पकड़ाया— “अरे मेरी जान, सोच रहा हूँ कि क्या नाश्ता बनाऊँ ताकि तुम वाह-वाह कर उठो।”

नीलेश्मा मुस्कराने लगी— “बातें तो ऐसी कर रहे हो जैसे सब कुछ बना ही दोगे। बनाओ ज़रा मटन। मुझे मटन खाना है।”

“क्या? मटन कौन खाता है सुबह सात बजे?”

“अपनी मम्मी की तरह मत बात करो। कौन खाता है, कौन करता है। मैं करती हूँ, मैं खाती हूँ। मुझे खाना है मटन। सुबह सात बजे।”

मुरली ने साँस ली, ख़ुद को संयत किया— “ठीक है, अभी बनाते हैं मटन। अभी के अभी जा के ले आता हूँ।”

मुरली कपड़े पहनने लगा। नीलेश्मा ने उसके शर्ट पहनने तक उसकी तरफ़ देखा भी नहीं। पैंट पहनते ही टोक दिया— “मटन रहने दो। दोपहर को बना लेना। अभी कुछ बढ़िया-सा नाश्ता बना दो।”

मुरली मुस्कुराने लगा— “मेरी जान, बिलकुल अभी कुछ बनाता हूँ। ऑमलेट?”

“ना जी ना। एक काम करो, दूध-कॉर्नफ़्लेक्स ही दे दो। कुछ देर बाद सूजी का हलवा बना देना।”

“किशोर कुमार के गाने और गरम-गरम दूध-कॉर्नफ़्लेक्स। मुझे लगता कि ये नया पॉप कल्चर बनेगा।” मुरली मुस्कराते हुए बोला।

नीलेश्मा ने हाथ-पैर चढ़ाते हुए धीरे से अंगड़ाई ली— “पॉप कल्चर में वॉशिंग मशीन चलने की भी आवाज़ आएगी। इस पॉप कल्चर में मेरे हसबैंड के बेसुरे गाने की भी आवाज़ बैकग्राउंड में चलती रहेगी।”

जब तक मुरली सारे कपड़े साफ़ करके आया, नीलेश्मा सो चुकी थी। मुरली ने फ़र्श भी बुहार दिया। बर्तन धीरे-धीरे साफ़ कर दिए। सूजी का हलवा बनाने लगा। वातावरण में शुद्ध देसी घी की सुगंध फैल गई। मुरली इयरफ़ोन लगाकर गाने सुनने लगा। कुछ देर बाद उसे लगा कि कोई बुला रहा है, पर उसने अनसुना कर दिया। तभी झटके से उसके कान से इयरफ़ोन हटा।

“तुम पागल हो गए हो क्या? इतनी देर से बुला रही हूँ। पेट दर्द करा दिया तुमने मेरा। सुन क्यों नहीं रहे हो?” नीलेश्मा पेट पकड़े खड़ी थी।

इस बार मुरली के दिमाग़ में फफककर आग लग गई। पर उसने तुरंत आग पर क़ाबू पाया। इयरफ़ोन हटाया, मोबाइल फ़ोन अपनी जगह पर रखा। फिर नीलेश्मा को गले लगाया और बिस्तर पर लिटा दिया।

“मेरी जान, अभी गर्म पानी की बोतल देता हूँ। उससे पहले ये हलवा खा लो। दवाई भी खा लो।”

नीलेश्मा कड़वा-सा मुँह बनाकर बिस्तर पर पड़ गई। हलवा वाक़ई बहुत अच्छा बना था। नीलेश्मा ने चम्मच उठाकर तीन बार माथे से लगाया जैसे कोर्निश बजा रही हो। फटाफट दवाई खायी और लेट गई।

“तुम भी मेरे पास लेट जाओ ना। लेटे-लेटे किताब पढ़ते रहना।”

नीलेश्मा ने मुरली को अपनी ओर खींचा। मुरली ने तुरंत लैपटॉप बंद किया, किताबें एक तरफ़ की और नीलेश्मा को चिपटाकर लेट गया।

“अच्छा, एक बात पता है तुम्हें?” मुरली ने नीलेश्मा के बाल सहलाते हुए पूछा।

नीलेश्मा कुनमुनायी— “क्या?”

“सारे नेताओं के अफ़ेयर होते हैं। सारे नेताओं के।”

“अरे यार। तुम्हारी बातें। नेता बूढ़े होते हैं। कौन इनसे करेगा अफ़ेयर।”

“अरे, तुम दुनिया-समाज को आँख-कान खोलकर नहीं देख रही क्या? ये बूढ़े ही सबसे ज़्यादा अफ़ेयर करने में लगे रहते हैं। ह्यू हेफ़नर याद है?”

“प्लेब्वॉय वाला? पर वो तो प्लेब्वॉय का मालिक था, वो करता भी क्या!”

“भई, सारे प्लेब्बॉय के ही मालिक हैं अपने-अपने दिमाग़ में। तुम्हें इनके क़िस्सों का कुछ पता भी नहीं है, लगता है।”

नीलेश्मा ने अपना मुँह ऊपर किया— “पहले किस्सी करो। आँखों पर। हाँ, माथे पर। हाँ। नाक पर। हर जगह करो। हाँ, अब बताओ।”

मुरली गम्भीरता से बताने लगा— “एक तो बैकवर्ड समाज के नेता थे। उन पर और उनके बेटे पर एक ही साथ एक लड़की के साथ थ्रीसम करने के आरोप थे।”

नीलेश्मा ने आँखें चौड़ी कर लीं— “सच में?”

मुरली ने होंठ बिचकाते हुए कहा— “और क्या। देखो, नेताओं के लिए ये बड़ी बातें नहीं होती हैं। सत्ता और ताक़त। इसकी वजह से औरतों के पास आना लॉजिकल है। अपने तनाव को निकालने के लिए और क्या करेंगे। बूढ़े तो बीस साल की लड़कियों के साथ दोस्ती रखना ज़्यादा पसंद करते हैं। उनकी चाइल्डिश बातों से उन्हें मज़ा आते रहता है।”

नीलेश्मा हँसने लगी— “भाई, ये दुनिया ग़ज़ब है।”

“देखो यार। अगर किसी का अफ़ेयर हो गया तो चलो ठीक है। लेकिन कुछ लोग ज़बर्दस्ती अफ़ेयर भी करना चाहते हैं। ताक़त के दम पर। पीछा करेंगे, तंग करेंगे। ये सब तो ग़लत है। या फिर झूठ बोलकर अफ़ेयर कर लेते हैं। कह देंगे कि शादी करनी है, फिर मुकर जाएँगे। बाद में जब लड़की ज़िद करती है तो मर्डर हो जाते हैं।”

“सारे पुरुषों के ही अफ़ेयर बता रहे हो। एक भी महिला नेता का अफ़ेयर नहीं बता रहे। रज़िया सुल्तान के बाद किसी का अफ़ेयर नहीं सुना। तथ्यात्मक रूप से। अफ़वाहें तो सबके बारे में मिल जाएँगी।” नीलेश्मा ने मुरली की पीठ सहलाते हुए कहा।

“अब तुम्हारा हसबैंड दुनिया की बेस्ट एग करी बनाएगा। अनियन फ़्राइड राइस। और सुपर सैलेड।”

“हाहाहा। सबसे आसान काम चुना तुमने। जब भी मुसीबत हो—एग करी। अब बैचलर नहीं रहते हो।”

“एग करी नहीं। दुनिया की बेस्ट एग करी। इसके पहले चाय पिलाता हूँ।”

चाय पीते हुए नीलेश्मा ने मुरली की ठुड्डी पकड़कर हिला दी। थोड़ी-सी चाय मुरली के घुटने पर गिर गई। मुरली से ज़्यादा इश-इश नीलेश्मा करती रही। ज़्यादा जला नहीं था, त्वचा हल्की-सी सिंक गई थी। लेकिन मुरली ऐसे मुँह बनाकर बैठा था जैसे बहुत त्याग कर दिया हो। नीलेश्मा ने फिर ठुड्डी पकड़कर हिला दी।

खाना बनाते हुए मुरली और नीलेश्मा संविधान, आज़ादी की लड़ाई, आज़ादी के बाद की लड़ाई और घर-परिवार की लड़ाई—हर चीज़ पर डिस्कस करते रहे। फिर प्लेट में खाना निकाल मुरली दो गिलास में कोल्डड्रिंक भी लाया। बिस्तर पर एक चादर बिछा सारा खाना रखा और किसी शेफ़ की तरह एक्टिंग करने लगा— “मैम, आपके लिए सब कुछ हाज़िर है।”

“सब कुछ?”

“हाँ जी, सब कुछ।”

शायद करी उतनी अच्छी नहीं बनी थी। नीलेश्मा के चेहरे से लग रहा था कि वो संतुष्ट नहीं है। मुरली ने तुरंत पूछ लिया— “क्या हुआ, अच्छी नहीं बनी है क्या?”

“बढ़िया बनी है। बढ़िया है। लेकिन मेड की तरह प्याज़ को ग्राइंड कर लेते तो ज़्यादा अच्छा होता।”

“ये तो मेरा कुकिंग स्टाइल है ना। अब किसी को कॉपी नहीं कर सकता जब प्रॉमिस कर दिया कि दुनिया की बेस्ट करी बन रही है तो।”

प्लेट वग़ैरह सब हटाने के बाद मुरली अब आर्टिकल लिखने बैठा। लैपटॉप खोला और ज़रूरी सूचनाएँ इकट्ठा करने लगा। नीलेश्मा बग़ल में लेट गई और कुछ-कुछ कहती रही। अचानक नीलेश्मा ने पेट पकड़ लिया— “यार, तुमने कोल्डड्रिंक क्यों पिला दी? ठण्डी चीज़ों से परहेज़ करते हैं। एकदम से दर्द करने लगा।”

मुरली के होश उड़ गए— “अरे यार, मैंने तो सोचा कि खाने के साथ तुम्हें अच्छा लगेगा। अच्छा आओ इधर।”

नीलेश्मा ने मुरली का हाथ पकड़ते हुए खींचा— “दवा दे दो और बग़ल में आकर लेटो।”

मुरली धीरे-धीरे नीलेश्मा की पीठ सहलाता रहा। उसके बाल सहलाता रहा। अब एसी की ठण्डक महसूस होने लगी थी। दोनों ने चादर ओढ़ ली। मायके और ससुराल की बात करते हुए कब दोनों की आँख लग गई, पता ही नहीं चला। मुरली की जब आँख खुली तो शाम के छह बज चुके थे। उसने उठकर फटाफट चाय बनाना शुरू कर दिया। खटर-पटर से नीलेश्मा की भी आँख खुली— “मसाला चाय बनाना।”

चाय पीते हुए नीलेश्मा ने चिंतित होकर पूछा— “आर्टिकल लिखा क्या? या स्क्रॉल ही करते रहोगे फ़ोन पर?”

मुरली ने कहा— “अभी तो नहीं लिख पाया। लिखता हूँ रात में। स्क्रॉल तो क्या ही करूँगा सोशल मीडिया पर। अब ये सब चीज़ें दिमाग़ को डिस्टर्ब करने लगी हैं। कब टाइम निकल जाता है स्क्रॉलिंग में, पता ही नहीं चलता।”

नीलेश्मा ने हामी भरी— “पर हमी नहीं, सारे सेलिब्रिटी और सारे इंटेलेक्चुअल, नेता सबकी प्रोफ़ाइल देखो तो सारे सोशल मीडिया पर दिन रात लगे हुए हैं। कई सारे तो रोज़ ही लड़ते रहते हैं। पता नहीं कैसे इतना टाइम मिल जाता है। ये भी कह देते हैं कि मैंने तो दिन-रात मेहनत की है। मैं तो सोता ही नहीं हूँ।”

“हाँ। और ये भी नहीं है कि हर व्यक्ति अपनी टीम रखेगा। ज़्यादातर के तो पर्सनल ट्वीट या पोस्ट दिखते हैं। इंस्टाग्राम पर तो पर्सनल ही रहते होंगे। कौन इसके लिए टीम हायर करेगा। टीम हायर करने पर भी कॉन्टेन्ट तो ख़ुद ही मॉनीटर करेंगे ना। ग़ज़ब हाल हो रखा है दुनिया का।”

फिर मुरली यूट्यूब पर नीलेश्मा को पुराने एक्टर्स के डांस वीडियोज़ दिखाने लगा। शम्मी कपूर, राजेंद्र कुमार, दिलीप कुमार, अशोक कुमार सबके वीडियो। कभी दोनों म्यूट कर देखते, कभी गाने के साथ देखते। किशोर कुमार की लफंदरई की एक्टिंग पर दोनों हँस पड़े। नीलेश्मा को यक़ीन ही नहीं हुआ कि इतने अच्छे सिंगर को ऐसे रोल करने पड़ते थे। फिर जब नीलेश्मा को पता चला कि अशोक कुमार ही पहले सुपरस्टार थे बॉलीवुड के और मंटो ने अशोक के ‘लड़कियों में पॉपुलर होने और कई अफ़ेयर होने’ की बात लिखी है तो हँसते-हँसते दोनों के पेट में बल पड़ गए। फिर गाने देखते-देखते नीलेश्मा ने दिव्या भारती के बारे में ख़ूब सर्च किया और मुरली को बताने लगी। दोनों ने ही ख़ूब आहें भरीं कि दिव्या भारती ज़िंदा होती तो सबसे बड़ी सुपरस्टार होती। नब्बे के दशक की सारी बड़ी फ़िल्में दिव्या ने साइन कर ली थीं। हम आपके हैं कौन, दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे, आंदोलन और पता नहीं क्या-क्या। लाडला तो आधी से ज़्यादा शूट भी कर ली थी। नीलेश्मा ने एक्सपर्ट कमेंट भी दिया— “दिव्या के चेहरे का बेबी फ़ैट गया नहीं था, अभी तो एकदम ही बच्ची थी। पर शरीर देखकर समझ नहीं आता कि सत्रह-अठारह की उम्र में बड़ी औरतों की तरह कैसे हो गया।”

कुछ देर बाद नीलेश्मा ने मुरली से लिपटते हुए कहा— “रात को खाना बाहर से मँगवा लो। पैसे बचाने के चक्कर में ज़्यादा काम मत करो। खाना मँगवा लो और बैठ के कुछ लिख लो। मैं ऐसे ही बात करते-करते सो जाऊँगी। बस ऐसे पकड़े रहो। पहला दिन है। पहला दिन भारी ही होता है।”

रात को जब मुरली लैपटॉप पर लगातार घूर रहा था और समझ नहीं पा रहा था कि क्या लिखे तब नीलेश्मा नींद में ही धीरे से कुनमुनायी—  “तुम दुनिया के सबसे बेस्ट हसबैंड हो।”

फिर धीरे से नीलेश्मा ने मुरली के हाथों पर अपने होंठ सटा दिए। बोली— “तुम एक बढ़िया ड्राफ़्ट लिख के दे दो, मैं संसद से क़ानून पास कराती हूँ कि पीरियड में लड़की को तो छुट्टी मिले ही, लड़की के पति को भी मिले। आख़िर पीरियड लड़कियों को समझने का संविधान ही तो है।”

मुरली मुस्करा पड़ा और नीलेश्मा के माथे पर एक चुम्मी दे थपकियाँ देने लगा।

सांत्वना श्रीकांत की कविता 'मेरा लाल रंग'

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